हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के अंतर्गत अर्की तहसील के बाड़ीधार क्षेत्र में सुचारू बिजली आपूर्ति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस क्षेत्र के दर्जनों गांवों को निर्बाध बिजली उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से सरली में करोड़ों रुपये (लगभग 7 करोड़) की लागत से एक नया सब-स्टेशन स्थापित किया गया है। लेकिन, विडंबना यह है कि महीनों पहले (जनवरी-फरवरी में) बनकर पूरी तरह तैयार होने के बावजूद, यह सब-स्टेशन स्टाफ (मैनपावर) के अभाव में अब तक चालू नहीं हो सका है। एक ओर जहां ग्रामीण हर 10-20 मिनट के बाद होने वाली बिजली की आंख-मिचौली से जूझ रहे हैं और दिहाड़ीदारों का कामकाज प्रभावित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचा तैयार होने के बावजूद सरकारी स्तर पर स्टाफ की नियुक्ति में हो रही देरी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर स्वाभाविक सवाल खड़े कर रही है। पढ़ें विस्तार से -
सोलन/अर्की: (HD News); हिमाचल प्रदेश में सुशासन और विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल सोलन जिले के अर्की में सरेआम खुल रही है। सरकार और प्रशासनिक सुस्ती का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि जनता की गाढ़ी कमाई के लगभग 7 करोड़ रुपये खर्च करके एक आधुनिक विद्युत सब-स्टेशन तो बना दिया गया, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी उसे चलाने के लिए सरकार स्टाफ (मैनपावर) मुहैया करवाने में नाकाम रही है। एक ओर बाड़ीधार क्षेत्र के दर्जनों गांव दिन-रात बिजली की आंख-मिचौली से त्रस्त हैं और दिहाड़ीदारों का रोजगार छिन रहा है। वहीं दूसरी ओर समाधान के लिए बना करोड़ों का यह प्रोजेक्ट सरकारी अनदेखी के चलते 'सफेद हाथी' बनकर जंग खा रहा है। यह मामला सिर्फ एक सब-स्टेशन के बंद पड़े होने का नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की उस घोर असंवेदनशीलता को उजागर करता है, जहां बुनियादी ढांचे के निर्माण के बाद उसे जनता के उपयोग में लाने के लिए सरकार के पास इच्छाशक्ति की भारी कमी नजर आती है।

दिन-रात चल रही बिजली की आंख-मिचौली, जनता बेहाल
बाड़ीधार और इसके साथ लगते अन्य गांवों, जिनमें घड़याच, बधेच, हाण आदि शामिल हैं, वहां बिजली की आपूर्ति पूरी तरह से चरमरा गई है। स्थानीय निवासियों मेहर चंद (हाण), खेम राज और लाल चंद (बधेच) ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि इलाके में बिजली दिन-रात आंख-मिचौली कर रही है। हालात ये हैं कि लाइट महज 10 मिनट के लिए आती है और फिर अगले 30 मिनट के लिए गायब हो जाती है। इसी संदर्भ में स्थानीय निवासी ओम प्रकाश ठाकुर ने भी विभाग को अवगत कराया है कि 10-20 मिनट की इस लुकाछिपी के कारण लोगों का भारी नुकसान हो रहा है। इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा उन दिहाड़ीदारों और कामगारों को भुगतना पड़ रहा है जिनका रोजगार पूरी तरह बिजली पर निर्भर है, क्योंकि बिजली न होने के कारण वे खाली बैठने को मजबूर हैं।

सांकेतिक तस्वीर
फॉल्ट ढूंढने में लगते हैं घंटों, जेई (JE) ने बताई तकनीकी विवशता
इस भीषण बिजली संकट के पीछे की तकनीकी विवशता को स्पष्ट करते हुए विद्युत विभाग के जेई (JE) ने जो जानकारी दी, वह साबित करती है कि 7 करोड़ का यह नया प्रोजेक्ट इलाके के लिए कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में इस पूरे क्षेत्र को डोमैहर से आने वाली लगभग 150 किलोमीटर लंबी एचटी (HT) लाइन से बिजली सप्लाई की जा रही है। इस एक ही लंबी लाइन से डोमैहर, जयनगर, बलेरा, भूमती और बाड़ीधार क्षेत्र के दर्जनों ट्रांसफॉर्मर जुड़े हुए हैं। चूंकि यह एक वन क्षेत्र है, इसलिए जब भी लाइन पर पेड़ की टहनियां गिरती हैं या कोई पक्षी टकराता है, तो पूरी लाइन में फॉल्ट आ जाता है। इतनी लंबी लाइन में पेट्रोलिंग करके फॉल्ट ढूंढने में कर्मचारियों को कई घंटे लग जाते हैं, जिससे पूरे इलाके (जैसे बलेरा, बाड़ीधार व जयनगर आदि) को लंबे समय तक भारी बिजली कटौती का संताप झेलना पड़ता है। जेई के मुताबिक, भविष्य की सुविधा के लिए सरली सब-स्टेशन से अलग-अलग फीडर (लाइनें) निकाल दिए गए हैं, ताकि एक फॉल्ट से पूरा इलाका प्रभावित न हो, लेकिन स्टाफ के अभाव में यह पूरी आधुनिक व्यवस्था ठप पड़ी है।

SDO दीनानाथ अत्री ने कहा- "स्टाफ की फाइल सरकार के पास लंबित"
विभागीय लाचारी को बयां करते हुए SDO दीनानाथ अत्री ने भी इस बात की स्पष्ट पुष्टि की है कि सरली सब-स्टेशन पूरी तरह से तैयार होने के बावजूद केवल इसलिए चालू नहीं हो पा रहा है क्योंकि वहां काम करने के लिए कर्मचारियों की भारी कमी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सब-स्टेशन के संचालन के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता है। इसके लिए विभाग द्वारा लगभग महीनों पहले (फरवरी के अंत में) ही सरकार को स्टाफ की मांग (रिक्वायरमेंट) भेज दी गई थी। फिलहाल यह मामला सरकारी प्रक्रिया में उलझा है और अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक जवाब या मंजूरी (अप्रूवल) नहीं मिली है। अत्री के अनुसार, अब केवल सरकार की हरी झंडी का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद ही कर्मचारियों की नियुक्ति कर इस करोड़ों के सब-स्टेशन को सुचारू रूप से चालू किया जा सकेगा।
XEN ने भी खड़े किए हाथ, बोले- 'अब सब कुछ सरकार पर निर्भर'
SDO और जेई की बातों पर मुहर लगाते हुए अर्की के अधिशासी अभियंता (XEN) संदीप कुमार का बयान भी सरकार की नाकामी को पूरी तरह उजागर करता है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सरली मोड़ पर बना यह सब-स्टेशन इसी साल फरवरी-मार्च महीने में ही बनकर पूरी तरह तैयार हो गया था। उनके अनुसार, सब-स्टेशन के बनते ही विभाग की ओर से इसे चलाने के लिए आवश्यक लेबर और मैनपावर की मांग को लेकर सरकार को बहुत पहले पत्र भेजा जा चुका है। अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया है कि विभाग अपना काम कर चुका है; जैसे ही सरकार से मैनपावर मिलेगी, इसे चालू कर दिया जाएगा, लेकिन फिलहाल यह पूरी तरह से राज्य सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

बता दें कि सरली सब-स्टेशन का यह पूरा मामला सरकारी कार्यप्रणाली और उसकी प्राथमिकताओं पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है। विभाग ने तकनीकी जरूरत को समझते हुए करोड़ों का ढांचा तो खड़ा कर दिया, लेकिन बिना ऑपरेटर और स्टाफ के यह आधुनिक मशीनरी किसी काम की नहीं है। जब तक राज्य सरकार कुंभकर्णी नींद से जागकर तुरंत प्रभाव से यहां मैनपावर की तैनाती नहीं करती, तब तक बाड़ीधार, घड़याच, बढेच, हाण और आसपास के गांवों की जनता यूं ही अंधेरे के दुष्चक्र में पिसती रहेगी। स्थानीय ग्रामीणों और दिहाड़ीदारों के टूटते सब्र का बांध सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। अब यह देखना है कि सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार इस 'सफेद हाथी' को कब तक स्टाफ मुहैया करवाकर जनता को राहत देती है, या फिर विकास के यह दावे इसी तरह फाइलों और जंग खाते सब-स्टेशनों में ही दम तोड़ते रहेंगे।