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हिमाचल | बिलासपुर

भक्तों की हर मनोकामनाएं पूरी करती हैं माँ श्री नैना देवी, दर्शन करने मात्र से दूर हो जाती हैं आंखों की बीमारियां, जाने हर रोज होने वाली आरती का समय..

December 19, 2021 11:57 AM
आज प्रातः कालीन शुभ श्रृंगार दर्शन माँ श्री नैना देवी जी

बिलासपुर : (हिमदर्शन समाचार); हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे धार्म‍िक स्थल हैं, जहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इनमें से सबसे अध‍िक महिमा माता नैना देवी की मानी जाती है। नैनादेवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में है। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी सती के नेत्र गिरे थे। लोगों की आस्था है कि यहां पहुंचने वालों की आंखों की बीमारियां दूर हो जाती हैं। इसी कारण इस शक्तिपीठ का नाम नैना देवी पड़ा। यह मंदिर माता शक्ति के भक्तों की आराधना का केंद्र है। नैना देवी मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। शक्तिपीठ श्री नैना देवी हिमाचल नहीं देश-विदेश के लोगों की आस्था का केंद्र है। 

पौराणिक काल से ही इस शक्तिपीठ में श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा है। मां भक्तों की सभी मन्नतें पूरी करती हैं। बिलासपुर जिला और पंजाब सीमा के साथ समुद्र तल से 1177 मीटर की ऊंचाई पर मां श्रीनयना देवी की स्थली है।

शक्तिपीठ के बारे में कथा प्रचलित - एक बार माता सती के पिता प्रजापति दक्ष ने बड़ा यज्ञ कराया लेकिन उस यज्ञ में उन्होंने माता सती और उनके पति भगवान शिव को न्योता नहीं दिया। फिर भी सती से हठ किया और वो यज्ञ में बिना बुलाए ही जा पहुंचीं। जहां राजा दक्ष ने उनके समक्ष भोलेनाथ को खूब अपमानित किया। पति के लिए ऐसे कटु वचन सती सह ना सकी और उन्होंने हवन कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिया। जब भगवान शिव को इस बारे में पता चला तो वे काफी क्रोधित हुए और गुस्से में उन्होंने रौद्र रूप धारण कर खूब तांडव किया और विध्वंस मचाया। वो सती के शव को लेकर घूमने लगे। 

भगवान शिव का ऐसा रूप देख देवतागण परेशान हो उठे और फिर उन्होंने भगवान विष्णु से शिव को शांत कराने की प्रार्थना की। तब विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता शरीर के 51 टुकड़े किए और जहां ये टुकड़े गिरे वो शक्तिपीठ कहलाए। इन्हीं में से दो शक्तिपीठ हिमाचल के बिलासपुर और उत्तराखंड के नैनीताल में भी मौजूद है। कहते हैं इन जगहों पर माता सती के नयन गिरे थे इसीलिए ये नैना देवी मंदिर कहलाए।

जानें, माँ के मन्दिर में हर रोज होने वाली श्रृंगार आरती दर्शन का समय..

मंगल आरती - माता की पहली आरती मंगल आरती कहलाती है । प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में लगभग 04:00 बजे पुजारी मंदिर खोलता है और मन्दिर में घण्टी बजा कर माता को जगाया जाता है। तदनंतर माता की शेय्या समेट कर रात को गडवी में रखे जल से माता के चक्षु और मुख धोये जाते है। उसी समय माता को काजू, बादाम, खुमानी, गरी, छुआरा, मिश्री, किशमिश, आदि में से पांच मेवों का भोग लगाया जाता है। जिसे 'मोहन भोग ' कहते है ।

मंगल आरती में दुर्गा सप्तशती में वर्णित महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, के ध्यान के मंत्र बोले जाते है । माता के मूल बीज मंत्र और माता श्रीनयनादेवी के ध्यान के विशिष्ट मंत्रो से भी माता का सत्वन होता है । ये विशिष्ट मन्त्र गोपनीय है । इन्हें केवल दीक्षित पुजारी को ही बतलाया जा सकता है। 

श्रृंगार आरती - श्रृंगार आरती के लिए मंदिर के पृष्ठ भाग की ढलान की और निचे लगभग 2 किलोमीटर की दुरी पर स्थित 'झीडा' नामक बाऊडी से एक व्यक्ति जिसे 'गागरिया' कहते है , नंगे पांव माता के स्नान एवं पूजा के लिए पानी की गागर लाता है । श्रृंगार आरती लगभग 6:00 बजे शुरू होती है जिसमे षोडशोपचार विधि से माता का स्नान तथा हार श्रृंगार किया जाता है । इस समय सप्तशलोकी दुर्गा और रात्रिसूक्त के श्लोको से माता की स्तुति की जाती है । माता को हलवा और बर्फी का भोग लगता है जिसे 'बाल भोग' कहते है ।

श्रृंगार आरती उपरांत दशमेश गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा स्थापित यज्ञशाला स्थल पर हवन यज्ञ किया जाता है । जिसमे स्वसित वाचन, गणपति पुजन, संकल्प, स्त्रोत, ध्यान, मन्त्र जाप, आहुति आदि सभी परिक्राएं पूर्ण की जाती है ।

मध्यान्ह आरती - इस अवसर पर माता को राज भोग लगता है । राज भोग में चावल, माश की दाल, मुंगी साबुत या चने की दाल, खट्टा, मधरा और खीर आदि भोज्य व्यंजन तथा ताम्बूल अर्पित किया जाता है । मध्यान्ह आरती का समय दोपहर 12:00 बजे है । इस आरती के समय सप्तशलोकी दुर्गा के श्लोको का वाचन होता है ।

सायं आरती - सायं आरती के लिए भी झीडा बाऊडी से माता के स्नान के लिए गागरिया पानी लाता है । लगभग 6:30 बजे माता का सायंकालीन स्नान एवं श्रृंगार होता है । इस समय माता को चने और पूरी का भोग लगता है । ताम्बूल भी अर्पित किया जाता है । इस समय के भोग को 'श्याम भोग' कहते है । सायं आरती में सोंदर्य लहरी के निम्नलिखित श्लोको का गायन होता है। 

शयन आरती - रात्रि 9:39 बजे माता को शयन करवाया जाता है । इस समय माता की शेय्या सजती है । दुध् और बर्फ़ी का भोग लगता है । जिसे 'दुग्ध् भोग' के नाम से जाना जाता है ।

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