हिमाचल प्रदेश के पंचायत चुनाव 2026 के दूसरे चरण में जहां पूरे प्रदेश में लोकतंत्र के पर्व को लेकर उत्साह दिख रहा है, वहीं हमीरपुर जिले की री पंचायत के कंगरी गांव वार्ड नंबर-1 से लोकतंत्र को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। करीब 300 मतदाताओं ने सड़क निर्माण की अनदेखी से नाराज़ होकर मतदान का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया। मतदान केंद्र पर सुरक्षाकर्मी और चुनाव अधिकारी दिनभर इंतजार करते रहे, लेकिन एक भी ग्रामीण वोट डालने नहीं पहुंचा। ग्रामीणों का साफ कहना है — “सड़क नहीं, तो वोट नहीं!”
हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश) : हिमाचल प्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव के दूसरे चरण का मतदान जहाँ राज्य के अन्य हिस्सों में लोकतंत्र के उत्सव के रूप में मनाया गया, वहीं हमीरपुर जिले की री पंचायत (वार्ड नंबर-1, कंगरी गाँव) में यह उत्सव मातम जैसी खामोशी में बदल गया। यहाँ के सभी मतदाताओं ने एकजुट होकर चुनाव का पूर्ण बहिष्कार कर दिया। प्रशासन की तमाम मिन्नतें, पुख्ता सुरक्षा इंतजाम और पोलिंग बूथ पर सजी कुर्सियाँ धरी की धरी रह गईं, लेकिन सुबह 7 बजे से लेकर शाम तक एक भी ग्रामीण (महिला या पुरुष) उंगली पर स्याही लगवाने नहीं पहुँचा।
यह कोई साधारण नाराजगी नहीं है, बल्कि सिस्टम की दशकों पुरानी संवेदनहीनता के खिलाफ जनता का सामूहिक और ऐतिहासिक 'मौन विद्रोह' है।

35 किलोमीटर का सफर: अपनी ही पंचायत जाने के लिए ₹1000 का 'टैक्स'
इस ऐतिहासिक बहिष्कार की सबसे चौंकाने वाली और दर्दनाक वजह प्रशासनिक ढाँचे की नाकामी है। ग्रामीणों का गाँव री पंचायत के अंतर्गत आता है, लेकिन भौगोलिक विषमता और बदइंतजामी का आलम यह है कि ग्रामीणों को अपने ही पंचायत घर पहुँचने के लिए 35 किलोमीटर का लंबा और घुमावदार सफर तय करना पड़ता है।
जंगल का खौफ और जेब पर डाका: ग्रामीणों ने बताया कि यदि वे गाड़ी से पंचायत घर जाते हैं, तो उनका कम से कम 1000 रुपये का किराया खर्च हो जाता है। गरीब ग्रामीणों के लिए एक छोटे से प्रमाण पत्र या सरकारी काम के लिए ₹1000 फूंकना मुमकिन नहीं है। वहीं दूसरी ओर, पंचायत घर पहुँचने का जो पैदल रास्ता है, वह घने जंगलों से होकर गुजरता है। इस जंगली रास्ते में हिंसक जानवरों का इतना खौफ है कि दिन के उजाले में भी कोई अकेला इंसान वहाँ से गुजरने की हिम्मत नहीं कर पाता।

'जमीनें दे दीं, पर सड़क न मिली': विकास के नाम पर सिर्फ धोखा
ग्रामीणों के इस आक्रोश की आग में घी डालने का काम सड़क की बदहाली ने किया है। गाँव के बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि वे सड़क निर्माण के लिए अपनी बेशकीमती निजी जमीनें तक प्रशासन के नाम कर चुके हैं। ग्रामीणों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन प्रशासन की फाइलें कछुए की रफ्तार से भी धीमी चलती रहीं। आज तक सड़क निर्माण का काम धरातल पर शुरू नहीं हो सका, जिसके कारण आज भी आपातकाल में किसी मरीज या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाना साक्षात यमराज से लड़ने जैसा है।
अंधेरे और प्यास के साये में जीने को मजबूर है वार्ड नंबर-1
'सड़क नहीं तो वोट नहीं' के नारे के साथ-साथ इस गाँव में मूलभूत सुविधाओं का घोर अकाल है। ग्रामीणों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी:
तीन-चार दिनों का ब्लैकआउट: डिजिटल इंडिया के इस दौर में कंगरी गाँव में बिजली की व्यवस्था इतनी चरमराई हुई है कि हल्की सी खराब मौसम के बाद तीन से चार दिनों तक पूरा गाँव घने अंधेरे में डूबा रहता है।
कागजों पर दौड़ रही पेयजल योजना: गाँव के लिए पीने के पानी की योजना (पेयजल योजना) स्वीकृत हो चुकी है, सरकारी दस्तावेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा है, लेकिन हकीकत यह है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी आज तक इस योजना से ग्रामीणों के घरों तक पानी की एक बूंद नहीं पहुँची। लोग आज भी प्राकृतिक स्रोतों और दूर-दराज से पानी ढोने को मजबूर हैं।
धरी रह गई प्रशासनिक मुस्तैदी, पूरे जिले में हड़कंप
चुनाव आयोग और जिला प्रशासन ने इस वार्ड में शांतिपूर्ण मतदान के लिए पूरी ताकत झोंक रखी थी। पोलिंग बूथ पर भारी पुलिस बल तैनात था, चुनाव अधिकारी मुस्तैद थे। सुबह जब ईवीएम मशीनें खुलीं, तो अधिकारियों को उम्मीद थी कि लोग आएंगे, लेकिन जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया और दोपहर से शाम हो गई, पोलिंग स्टेशन की वीरानी ने प्रशासन की चिंता को हड़कंप में बदल दिया।
100 फ़ीसदी मतदान बहिष्कार की यह खबर जैसे ही हमीरपुर जिला मुख्यालय पहुँची, प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया। खुफिया विभाग और आला अधिकारी इस 'चुनावी नाकाबंदी' के राजनीतिक और सामाजिक असर का आकलन करने में जुट गए हैं।
यह सिर्फ बहिष्कार नहीं, व्यवस्था की हार है..
कंगरी गाँव के करीब 300 मतदाताओं का यह फैसला नेताओं के खोखले वादों और नौकरशाही की लालफीताशाही के मुंह पर एक करारा तमाचा है। जब एक नागरिक को बुनियादी हक (सड़क, बिजली, पानी) के लिए अपनी जेब से ₹1000 खर्च करने पड़ें या घने जंगल में जान जोखिम में डालनी पड़े, तो पोलिंग बूथ पर लगी ईवीएम मशीन का बटन दबाना उसके लिए बेमानी हो जाता है। कंगरी गाँव ने पूरे देश के नीति-नियंताओं को यह कड़ा संदेश दे दिया है कि यदि लोकतंत्र में जनता को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो जनता भी लोकतंत्र के इस सबसे बड़े अनुष्ठान से खुद को अलग करने में संकोच नहीं करेगी।
ब्यूरो रिपोर्ट, हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश)।