जब लोकतांत्रिक सरकारें लोक-कल्याण के सिद्धांतों को दरकिनार कर कारपोरेट दफ्तरों की तरह केवल 'नफा-नुकसान' और 'संख्या बल' के तराजू पर जनहित के फैसले तोलने लगें, तो व्यवस्था का चरमराना तय है। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार द्वारा 75 से कम छात्र संख्या वाले कॉलेजों को बंद करने की अदूरदर्शी नीति के तहत, अर्की विधानसभा क्षेत्र के राजकीय महाविद्यालय जयनगर पर ताला लटकाने की अधिसूचना ने एक बड़े प्रशासनिक कबाड़खाने को जन्म दे दिया है। महज 61 की छात्र संख्या का लकीर-के-फकीर जैसा बहाना बनाकर सरकार ने एक झटके में आसपास की 20 दुर्गम पंचायतों के सैकड़ों ग्रामीण युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
इस तुगलकी फरमान के खिलाफ सोलन जिला परिषद के सूरजपुर वार्ड-02 से नवनिर्वाचित सदस्य शशिकांत शर्मा ने मुख्यमंत्री को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए एक बेहद तल्ख और सुदृढ़ ज्ञापन सौंपा है, जो केवल एक प्रशासनिक पत्राचार नहीं बल्कि इस पहाड़ी अंचल की 80 प्रतिशत उन बेटियों की चीख है, जिनका कॉलेज जाने का सपना अब 40 से 50 किलोमीटर दूर अर्की या बिलासपुर के कठिन रास्तों में दम तोड़ने को मजबूर कर दिया गया है। यह तीखा विरोध सीधे तौर पर शिमला के सचिवालय में बैठे उन नीति-नियंताओं से सवाल करता है कि अपनी खुद की ढांचागत विफलताओं और शिक्षकों की कमी के पाप का घड़ा, इन निर्दोष और साधनहीन ग्रामीण छात्रों के सिर पर क्यों फोड़ा जा रहा है ? पढ़ें विस्तार से..
सोलन: (HD News); हिमाचल प्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन और प्रशासनिक सुधारों के तहत बुनियादी ढांचे को सुव्यवस्थित करने की कवायद अब नीतिगत विरोधाभासों के घेरे में है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा 75 से कम छात्र संख्या वाले शिक्षण संस्थानों को बंद करने या विलय करने के निर्णय के तहत अर्की विधानसभा क्षेत्र के राजकीय महाविद्यालय जयनगर पर ताला लगाने की अधिसूचना जारी की गई है। 61 छात्रों की वर्तमान संख्या के आधार पर लिए गए इस फैसले ने एक बड़े क्षेत्रीय और नीतिगत विवाद को जन्म दे दिया है। इस प्रशासनिक कदम के विरोध में सोलन जिला परिषद (सूरजपुर वार्ड-02) के सदस्य शशिकांत शर्मा ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को एक जनहितकारी ज्ञापन सौंपकर इस अधिसूचना को जनहित में तुरंत रद्द करने की मांग की है। यह मामला अब केवल एक संस्थान के बंद होने का नहीं, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की सुलभता और सरकारी मापदंडों की व्यवहार्यता के बीच संतुलन का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है।

बुनियादी ढांचा मजबूत करने के बजाय सीधे संस्थान को बंद कर देना कितना न्यायसंगत ?
पत्रकारिता के निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखें तो इस विवाद के दो पहलू हैं। पहला पहलू सरकार का प्रशासनिक और वित्तीय तर्क है, जिसके तहत कम छात्र संख्या वाले संस्थानों को चलाना संसाधनों का अनुचित उपयोग माना जाता है। जयनगर कॉलेज में वर्तमान छात्र संख्या 61 होना इस नीति के दायरे में आता है। परंतु, इस सिक्के का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि इस गिरावट के लिए जिम्मेदार कारक क्या हैं? स्थानीय जनप्रतिनिधि और तथ्यों के अनुसार, अपने शुरुआती सत्रों में इस कॉलेज में छात्रों की संख्या 170 से 200 के बीच दर्ज की गई थी। समय के साथ कॉलेज के अपने स्थायी भवन का निर्माण न होना, प्राध्यापकों की निरंतर कमी और शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव इसके ग्राफ गिरने का मुख्य कारण बने। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बुनियादी ढांचा मजबूत करने के बजाय सीधे संस्थान को बंद कर देना न्यायसंगत है?
भौगोलिक विषमता और 80% छात्राओं के भविष्य का संकट
पहाड़ी राज्यों में कोई भी नीति बनाते समय वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जयनगर कॉलेज आसपास की लगभग 20 पंचायतों के सैकड़ों ग्रामीण युवाओं, विशेषकर युवतियों के लिए उच्च शिक्षा का एकमात्र सहारा है। इस संस्थान का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि यहाँ 80% से अधिक संख्या छात्राओं की है। जयनगर से नजदीकी वैकल्पिक संस्थानों (अर्की या बिलासपुर कॉलेज) की दूरी लगभग 40 से 50 किलोमीटर है। दुर्गम रास्तों, सीमित परिवहन सेवाओं और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच ग्रामीण परिवेश के परिवारों के लिए अपनी बेटियों को इतनी दूर भेजना न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी अत्यंत कठिन है। इस दृष्टि से, सरकार का यह फैसला अनजाने में ही सही, लेकिन महिला साक्षरता और महिला सशक्तिकरण के राज्यव्यापी संकल्पों को पीछे धकेलता हुआ प्रतीत होता है।

एक संतुलित नीति वह होती है जो समस्याओं को खत्म करने के बजाय उनका समाधान ढूंढे। जिला परिषद सदस्य शशिकांत शर्मा ने अपने ज्ञापन में मुख्यमंत्री के समक्ष एक रचनात्मक और तार्किक प्रस्ताव भी रखा है। उनका दावा है कि यदि सरकार इस संस्थान को बंद करने की नीति को छोड़कर इसके लंबित भवन निर्माण कार्य को तुरंत गति दे और आवश्यक शैक्षणिक स्टाफ की तैनाती सुनिश्चित करे, तो यहाँ छात्रों की संख्या पुनः बढ़कर 300 के पार जा सकती है। लोक कल्याणकारी राज्य में सरकार की भूमिका केवल एक वित्तीय प्रबंधक की नहीं, बल्कि एक संरक्षक की होती है, जहाँ दूर-दराज के क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचाना घाटे और मुनाफे के गणित से परे होना चाहिए।
जयनगर कॉलेज को बंद करने की अधिसूचना ने नीति-नियंताओं के बंद कमरों के फैसलों और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। जहाँ एक तरफ सरकार प्रशासनिक और वित्तीय अनुशासन का हवाला दे रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण जनता इसे अपने मौलिक अधिकारों पर चोट मान रही है। अब यह पूरी तरह मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के राजनैतिक विवेक और संवेदनशीलता पर निर्भर करता है कि वे अफसरशाही के तय मानकों पर अडिग रहते हैं या फिर जनभावनाओं और ग्रामीण बेटियों के भविष्य को प्राथमिकता देते हुए इस अधिसूचना पर पुनर्विचार करते हैं। क्षेत्र की जनता की निगाहें अब शिमला सचिवालय से आने वाले अगले कदम पर टिकी हैं।

अस्वीकरण: यह रिपोर्ट जिला परिषद सदस्य शशिकांत शर्मा द्वारा मुख्यमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तथ्यों एवं जनप्रतिनिधियों के दावों पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है। रिपोर्ट में व्यक्त कुछ तथ्य और आंकड़े ज्ञापन में उल्लिखित दावों पर आधारित हैं। समाचार का उद्देश्य विषय के विभिन्न पहलुओं को सामने लाना है, न कि किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करना।