लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब जनता अपना अमूल्य वोट देकर किसी प्रतिनिधि को सत्ता की कुर्सी सौंपती है, तो वह अपने क्षेत्र का सर्वांगीण विकास चाहती है, न कि प्रशासनिक फाइलों और तकनीकी औपचारिकताओं का अंतहीन बोझ। अर्की विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक विशाल जनसभा में प्रख्यात समाजसेवी राजेंद्र ठाकुर ने वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक ढर्रे पर अब तक का सबसे तीखा प्रहार किया है। भरे मंच से व्यवस्था को आईना दिखाते हुए उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार कोई व्यापारी या बनिया नहीं है, जिसका मुख्य ध्येय सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना हो; सरकारों का पहला और आखिरी कर्तव्य जनहित होना चाहिए। सरकारी महकमों द्वारा अक्सर दिए जाने वाले 'घाटे' के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए राजेंद्र ठाकुर ने सीधे राजनेताओं की नीयत और उनकी कार्यप्रणाली पर ऐसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसने शिमला से लेकर अर्की तक के सियासी गलियारों में भारी हलचल मचा दी है। { पढ़ें विस्तार से..}
सोलन/अर्की: (HD News); लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता जब अपना बहुमूल्य वोट देकर किसी प्रतिनिधि को सत्ता की कुर्सी पर बिठाती है, तो वह विकास की उम्मीद करती है, न कि प्रशासनिक फाइलों और तकनीकी औपचारिकता का बोझ। अर्की विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आयोजित एक जनसभा में प्रख्यात समाजसेवी राजेन्द्र ठाकुर ने वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक ढर्रे पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने भरे मंच से व्यवस्था को आईना दिखाते हुए कहा कि सरकार कोई व्यापारी या बनिया नहीं है, जिसका मुख्य ध्येय सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना हो; सरकारों का पहला और आखिरी कर्तव्य जनहित और जन-कल्याण होना चाहिए।

जनसभा में उमड़े ग्रामीणों और विशेषकर मातृशक्ति को संबोधित करते हुए राजेन्द्र ठाकुर ने सरकारी महकमों द्वारा अक्सर दिए जाने वाले 'घाटे और नुकसान' के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में कहा कि जब भी ग्रामीण क्षेत्रों में नई बसें चलाने या जनसुविधाएं बढ़ाने की मांग उठती है, तो अधिकारी और नेता घाटे का रोना रोने लगते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्ष 1952 से लेकर आज 2026 तक देश या प्रदेश की कौन सी ऐसी सरकार रही है जो पूरी तरह मुनाफ़े में चली हो? जब पूरी सरकार ही लोन और घाटे के सहारे चलती है, तो जनता के बुनियादी हक जैसे— स्कूल, डिस्पेंसरी या बसों को घाटे का बहाना बनाकर बंद या मर्ज क्यों किया जा रहा है?
अर्की से गरजे समाजसेवी राजेन्द्र ठाकुर: "सरकारें जन-कल्याण के लिए हैं, मुनाफ़ा कमाने वाली बनिया नहीं; जनता को NOC और एस्टीमेट के जाल में उलझाना बंद करें नेता" -
राजेन्द्र ठाकुर ने नेताओं की नीयत पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि अक्सर चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि 'बजट और फंड की कमी' का बहाना बनाने लगते हैं। उन्होंने जनता का आह्वान करते हुए कहा कि ऐसे नेताओं से सीधे सवाल पूछा जाना चाहिए कि यदि आपके पास विकास के लिए विज़न और फंड नहीं था, तो आप जनता के बीच वोट मांगने और सत्ता में बैठने आए ही क्यों थे? उन्होंने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि सरकार के पास अकेले पेड़-पौधों और प्राकृतिक संपदा के रूप में ही कम से कम 100 अरब रुपये से अधिक की संपत्ति मौजूद है। ऐसे में सरकार को गरीब या बेबस बताकर जनता के काम रोकना सरासर नाइंसाफी है।
'NOC' और 'एस्टीमेट' के जाल पर आक्रोश: "यह काम जनता का नहीं, जनता के प्रतिनिधियों का है"
प्रशासनिक लालफीताशाही पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए समाजसेवी राजेन्द्र ठाकुर ने कहा कि जब भी कोई गरीब ग्रामीण किसी विकास कार्य की मांग लेकर जाता है, तो उसे 'एस्टीमेट लाने', 'NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) बनवाने' या 'FRA (वन अधिकार अधिनियम) क्लियर कराने' जैसे तकनीकी मकड़जाल में उलझा दिया जाता है। उन्होंने साफ़ किया कि एक सीधे-सादे ग्रामीण को इन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में कुछ नहीं पता होता। यह काम जनता का नहीं, बल्कि उन पंचायत प्रधानों, बीडीसी सदस्यों, जिला परिषद, विधायकों और सांसदों का है जिन्होंने जनता का विश्वास और वोट हासिल किया है। सचिवालय (Secretariat) जाना, वित्त सचिव से बजट पास करवाना और विभागों से स्वीकृतियां लेना पूरी तरह से चुने हुए प्रतिनिधियों की नैतिक और कानूनी ज़िम्मेदारी है।

नेताओं को कोरी बयानबाज़ी छोड़कर धरातल पर काम करने की नसीहत देते हुए राजेन्द्र ठाकुर ने अपने पिछले सेवाकाल का एक बेजोड़ उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि अर्की विधानसभा क्षेत्र की 75 पंचायतों में वे लगातार सक्रिय रहे हैं और इच्छाशक्ति हो तो काम कैसे होता है, यह उन्होंने करके दिखाया है। उन्होंने दावा किया कि कोठी घाट्टी से लेकर तालाब व ऊंचे गांव तक की करीब 700 मीटर लंबी सड़क को किसी बड़े सरकारी लोक निर्माण विभाग ने नहीं, बल्कि पंचायत के स्तर पर 75 फुट चौड़ी सड़क के रूप में विकसित किया गया था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज शिमला या अन्य मुख्य मार्गों पर भी सरकारें मुश्किल से 12 से 14 फुट चौड़ी सड़कें दे पा रही हैं, जबकि सही विज़न हो तो पंचायतें खुद ऐतिहासिक काम कर सकती हैं।
सशक्त विपक्ष की वकालत और मर्यादित राजनीति का संदेश
अपने संबोधन के समापन पर राजेन्द्र ठाकुर ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक मजबूत और सजग विपक्ष का होना अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि वे लगातार जनता के बीच सुख-दुख में खड़े रहते हैं क्योंकि जनहित की आवाज़ को दबने नहीं दिया जा सकता। हालांकि, उन्होंने राजनीति में मर्यादा का एक अनुकरणीय संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि वे कभी भी किसी मंच से या मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर किसी विपक्षी नेता या दल की व्यक्तिगत बुराई नहीं करते। उनका एकमात्र लक्ष्य केवल और केवल 'डेवलपमेंट' (विकास) है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जब बात समाज की बेहतरी की हो, तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर जनप्रतिनिधि को सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा।

जनहित में विशेष टिप्पणी: समाजसेवी राजेन्द्र ठाकुर का यह बयान महज़ एक भाषण नहीं, बल्कि आम जनता की उस दबी हुई आवाज़ की गूंज है जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुकी है। लोकतंत्र में यदि जनता वोट देकर अपना 'विश्वास' सौंपती है, तो व्यवस्था को भी पूरी ईमानदारी से वह कर्ज चुकाना होगा।
समाजसेवी राजेंद्र ठाकुर का यह बयान केवल अर्की या हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक की आवाज है जो ईमानदारी से टैक्स देता है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अगर जनता अपना भरोसा सौंपकर नेताओं को सत्ता के शीर्ष पर बिठाती है, तो व्यवस्था का भी यह कर्तव्य है कि वह पूरी ईमानदारी के साथ जनता का काम करे। अब समय आ गया है कि सजग नागरिक 'घाटे का बहाना' बनाने वाले और 'NOC' की फाइलें थमाने वाले जनप्रतिनिधियों से सीधे और कड़े सवाल पूछना शुरू करें, क्योंकि एक जागरूक समाज ही एक जवाबदेह सरकार बना सकता है।