न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र और चुनी हुई सरकार की वित्तीय मजबूरियों के बीच की लकीर आखिर कहाँ खत्म होती है? हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शिमला में हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में इस सुलगती हुई बहस को एक बेहद आक्रामक और नया मोड़ दे दिया है। एक गरिमामयी मंच से सिस्टम की कार्यप्रणाली पर करारी चोट करते हुए सीएम सुक्खू ने जो कड़वा सच उजागर किया, उसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। 'आजादी के 80 साल बाद स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए सरकार को कोर्ट के आदेश पर 5 लाख रुपये चुकाने पड़े' - मुख्यमंत्री का यह दर्द केवल एक पहाड़ी राज्य की मजबूरी का रोना नहीं है, बल्कि यह उन अदालती फैसलों के खिलाफ एक मुखर आवाज है जो बिना खजाने की हकीकत जाने सरकारी सिस्टम को पंगु बना रहे हैं। राजनेता अमूमन जिस न्यायपालिका के सामने चुप्पी साध लेते हैं, उसी मंच से सुक्खू ने दो-टूक कह दिया कि न्यायालय गलतियां सुधार सकता है, लेकिन नए नियम नहीं बना सकता, और जजों के सामने ही यह कड़वा सवाल दाग दिया - "क्या यह न्यायोचित है?"
शिमला: (HD News); शिमला में हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह का गरिमामयी मंच उस वक्त एक सुलगती हुई बहस का गवाह बन गया, जब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावलिया और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की मौजूदगी में न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर बड़ी बात कह दी। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि 'सरकार से कोई गलती होती है तो न्यायालय उसे ठीक करता है, लेकिन न्यायालय नए नियम नहीं बना सकता।' इसी मंच से उन्होंने सिस्टम की कार्यप्रणाली पर करारी चोट करते हुए वह कड़वा सच उजागर किया कि आजादी के 80 साल बाद भी चुनी हुई सरकार को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एक सरकारी मैदान के इस्तेमाल पर हाई कोर्ट की शर्त के कारण 5 लाख रुपये चुकाने पड़े। राजनेताओं की अमूमन रहने वाली चुप्पी को तोड़ते हुए सुक्खू का यह दर्द केवल एक पहाड़ी राज्य की मजबूरी नहीं है, बल्कि यह खजाने की हकीकत को नजरअंदाज करने वाले उन अदालती फैसलों के खिलाफ एक खुली बगावत है, जो सरकारी सिस्टम को पंगु बना रहे हैं।

'तिरंगा फहराने के भी चुकाए 5 लाख!' जजों के सामने CM सुक्खू ने खोला अदालती फैसलों से चरमराते खजाने का दर्द
सीएम सुक्खू ने बिना किसी लाग-लपेट के खजाने का 'कच्चा चिट्ठा' खोलते हुए स्पष्ट किया कि प्रदेश के कुल राजस्व का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा केवल सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर खर्च हो जाता है, जिसे कम करना आज के समय की बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि कोई भी निर्वाचित सरकार अपने कर्मचारियों को उनके देय वित्तीय लाभों से वंचित नहीं रखना चाहती, लेकिन जनहित, नियमों और राजकोषीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखना शासन की सबसे अहम जिम्मेदारी है। अदालतों द्वारा भर्ती नियमों से बाहर जाकर वित्तीय लाभ देने वाले आदेशों पर चिंता जताते हुए उन्होंने साफ किया कि बिना वित्तीय संसाधनों को परखे आने वाले ऐसे फैसले सरकार के वित्तीय संसाधनों को गड़बड़ा देते हैं।
हालांकि, न्यायपालिका के नीतिगत और वित्तीय हस्तक्षेप पर तल्ख तेवर अपनाने वाले मुख्यमंत्री ने प्रदेश में बढ़ते नशे के खिलाफ कानूनी लड़ाई को धार देने की प्रतिबद्धता भी मजबूती से जताई। युवाओं में नशीली दवाओं के दुरुपयोग की बढ़ती चुनौती से निपटने पर जोर देते हुए उन्होंने एक बड़ा ऐलान किया कि कांगड़ा और मंडी जिले में ड्रग्स से जुड़े अपराधों (NDPS एक्ट) के त्वरित निपटारे के लिए दो नई अदालतें स्थापित की जाएंगी। यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार जहाँ एक ओर अपनी नीतिगत स्वतंत्रता और खजाने की रक्षा के लिए मुखर है, वहीं दूसरी ओर नशे के खिलाफ संस्थागत कार्रवाई को मजबूत करने के लिए न्यायपालिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को भी तैयार है।

डिस्क्लेमर: यह समाचार रिपोर्ट हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा दिए गए सार्वजनिक वक्तव्य और उपलब्ध वीडियो फुटेज के तथ्यों पर आधारित है। न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र, अदालती आदेशों और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को लेकर व्यक्त किए गए सभी विचार और दावे सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के हैं। इस खबर का उद्देश्य केवल एक महत्वपूर्ण नीतिगत विमर्श और जनहित से जुड़ी सूचना को आप तक पहुँचाना है। हमारा मीडिया मंच न्यायपालिका या किसी भी संवैधानिक संस्था की गरिमा और उनके फैसलों का पूर्ण सम्मान करता है।