शिमला : 12 अक्टूबर 2026; हिमाचल प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा 'सर्विस बॉन्ड' का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। शिमला के प्रमुख अस्पताल इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) की रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) ने प्रदेश सरकार से अनिवार्य तीन वर्षीय सर्विस बॉन्ड नीति की तत्काल समीक्षा करने की गुहार लगाई है। डॉक्टरों की मांग है कि बॉन्ड से जुड़ी 40 लाख रुपये की भारी-भरकम पेनल्टी को कम किया जाए और पोस्टग्रेजुएट (PG) डॉक्टरों के स्टाइपेंड को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बढ़ाया जाए। 2026 की NEET-PG काउंसलिंग से ठीक पहले उठी इस मांग ने चिकित्सा जगत में नई चर्चा छेड़ दी है।
क्या है डॉक्टरों की मुख्य चिंता?
रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन का स्पष्ट कहना है कि तीन साल की अनिवार्य सरकारी सेवा और नियम टूटने पर 40 लाख रुपये का जुर्माना नए मेडिकल स्नातकों के लिए एक बड़ा मानसिक और आर्थिक बोझ है। एसोसिएशन का तर्क है कि इतनी कठोर पेनल्टी और लंबी सेवा अवधि के कारण देश के कई मेधावी छात्र हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने से कतरा सकते हैं। इसके अलावा, डॉक्टरों का कहना है कि PG के दौरान उन पर पढ़ाई के साथ-साथ मरीजों की देखभाल का भारी दबाव होता है, लेकिन उसके एवज में मिलने वाला स्टाइपेंड बेहद कम है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर क्या होगा असर?
यह मुद्दा सीधे तौर पर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा है। एक तरफ जहां मेडिकल कॉलेजों में बेहतरीन प्रतिभाओं को आकर्षित करना जरूरी है, वहीं सरकार के सामने ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित करने की भी बड़ी चुनौती है। सर्विस बॉन्ड का मूल उद्देश्य ही राज्य के दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है। ऐसे में सरकार को डॉक्टरों की जायज मांगों और प्रदेश की स्वास्थ्य जरूरतों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन तलाशना होगा।
सरकार के फैसले का इंतजार
एसोसिएशन ने अपना मांग पत्र IGMC के प्रिंसिपल, स्वास्थ्य सचिव, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री तक पहुंचा दिया है। फिलहाल सरकार की ओर से इस नीति में किसी भी तरह के बदलाव या राहत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रदेश सरकार आगामी काउंसलिंग से पहले इन युवा डॉक्टरों को क्या राहत देती है।