हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को करारा झटका देते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रमुख अभियंता (इंजीनियर-इन-चीफ) नरिंदर पाल सिंह चौहान को दिए गए छह महीने के सेवा विस्तार को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। अदालत ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से 'अवैध और मनमाना' करार देते हुए चौहान को तुरंत अपना पद खाली करने का आदेश दिया है। साथ ही, योग्य अधिकारियों के अधिकारों की अनदेखी कर रोकी गई चयन प्रक्रिया को बहाल करते हुए सरकार को 11 नवंबर तक नए प्रमुख अभियंता की नियुक्ति का सख्त अल्टीमेटम दिया है। यह फैसला प्रशासनिक स्तर पर चहेतों को फायदा पहुंचाने की सरकारी कार्यप्रणाली पर एक बड़ा न्यायिक प्रहार है। पढ़ें विस्तार से..

शिमला: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के प्रशासनिक फैसलों पर सख्त रुख अपनाते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रमुख अभियंता (इंजीनियर-इन-चीफ) नरिंदर पाल सिंह चौहान के छह महीने के सेवा विस्तार को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। अदालत ने इस फैसले को पूरी तरह से 'अवैध और मनमाना' करार देते हुए चौहान को तुरंत अपना पद खाली करने के निर्देश दिए हैं। उच्च न्यायालय का यह फैसला राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद के आरोपों पर एक बड़ा प्रहार माना जा रहा है।

पदोन्नति प्रक्रिया रोक कर दिया गया था अनुचित लाभ
इस पूरे विवाद की जड़ राज्य सरकार का वह कदम था, जिसमें नियमों को दरकिनार कर एक ही व्यक्ति को फायदा पहुंचाया गया। अदालत में पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, मौजूदा प्रमुख अभियंता के सेवानिवृत्त (रिटायर) होने से पहले ही उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति के लिए अप्रैल में विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। स्क्रीनिंग कमेटी ने अपना काम शुरू कर दिया था, लेकिन सरकार ने अचानक बिना किसी ठोस कारण के इस चयन प्रक्रिया को बीच में ही रोक दिया और चौहान को छह महीने का एक्सटेंशन थमा दिया। इस फैसले से विभाग के उन वरिष्ठ मुख्य अभियंताओं (Chief Engineers) में भारी रोष था, जो पदोन्नति की कतार में थे और अंततः उन्होंने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

'जनहित' की सरकारी दलील को कोर्ट ने किया खारिज
अदालती सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार ने इस सेवा विस्तार को 'जनहित' (Public Interest) और 'प्रशासनिक अनिवार्यता' साबित करने की कोशिश की, तो कोर्ट ने इसे सिरे से नकार दिया। अदालत ने अपनी तल्ख टिप्पणी में स्पष्ट किया कि जब लोक निर्माण विभाग में इस शीर्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के लिए एक से बढ़कर एक योग्य, अनुभवी और वरिष्ठ अधिकारी कतार में खड़े हैं, तो ऐसे में 'जनहित' का हवाला देकर किसी एक विशेष व्यक्ति को पद पर बनाए रखना तर्कसंगत नहीं है। कोर्ट ने इसे सत्ता का दुरुपयोग और कतार में खड़े अन्य योग्य अधिकारियों के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन माना।

11 नवंबर तक नई नियुक्ति का सख्त अल्टीमेटम
हाई कोर्ट ने मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए केवल सेवा विस्तार ही रद्द नहीं किया, बल्कि आगे की कार्रवाई के लिए भी स्पष्ट रूपरेखा तय कर दी है। अदालत ने राज्य सरकार को 11 नवंबर तक नए प्रमुख अभियंता (इंजीनियर-इन-चीफ) की नियमित नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का अल्टीमेटम दिया है। सरकार को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि जो स्क्रीनिंग और चयन प्रक्रिया अप्रैल में अवैध रूप से रोक दी गई थी, उसे तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए और बिना किसी देरी के योग्य अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए।
