भारतीय कुश्ती पिछले कुछ सालों से पदकों से ज्यादा राजनीतिक अखाड़े, जंतर-मंतर के प्रदर्शनों और कोर्ट-कचहरी के चक्करों के लिए चर्चा में थी। लेकिन तमाम विवादों, आंसुओं और प्रशासनिक गतिरोधों को पीछे छोड़ते हुए भारतीय पहलवानों ने विश्व चैंपियनशिप में जो तहलका मचाया है, उसने हर आलोचक के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। तिरंगे को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर सबसे ऊंचा लहराता देख देश का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।

पिछले कुछ महीनों में खेल महासंघ पर लगे प्रतिबंधों और आंतरिक राजनीति ने खिलाड़ियों का मनोबल पूरी तरह से तोड़ने की कोशिश की थी। संसाधनों की कमी, विदेशी कोचों के अभाव और बिना किसी उचित राष्ट्रीय कैंप के ट्रेनिंग करने के बावजूद, इन पहलवानों ने जिस लौह-जज्बे का मुजाहिरा किया है, वह किसी भी फिल्मी स्क्रिप्ट से ज्यादा असली और रोमांचक है। उन्होंने मैट पर केवल अपने विदेशी प्रतिद्वंद्वियों को नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम को पटखनी दी है जिसने उन्हें लाचार समझ लिया था।

इस चैंपियनशिप में सबसे बड़ी और प्रेरणादायक कहानी एक युवा महिला पहलवान की रही, जिसने चोट और गुमनामी के गहरे अंधेरे से निकलकर सीधे गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। फाइनल मुकाबले में आखिरी 10 सेकंड में हारी हुई बाजी को पलटते हुए उसने जो स्वर्ण पदक जीता, वह भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। इस जीत ने दुनिया को साफ पैगाम दे दिया है कि भारतीय मिट्टी की कुश्ती में आज भी बड़े-बड़ों को झुकाने का माद्दा है।
हालांकि, इस शानदार सफलता के बाद भी कुश्ती संघ और खिलाड़ियों के बीच की जमी बर्फ पूरी तरह नहीं पिघली है। जीत के बाद पदक विजेताओं ने जिस दबी जुबान से सिस्टम के अधूरे समर्थन पर अपनी पीड़ा व्यक्त की, उसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अब यह सीधे तौर पर खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी है कि इन चैंपियंस को राजनीति की भेंट चढ़ने से बचाया जाए और आगामी ओलंपिक की तैयारी के लिए एक पारदर्शी और साफ-सुथरा माहौल दिया जाए।
