भारतीय फुटबॉल फैंस के लिए इससे बुरा सपना शायद ही कोई और हो सकता है। फीफा वर्ल्ड कप क्वालीफायर्स के एक बेहद अहम मुकाबले में एक निचली रैंकिंग वाली टीम से मिली शर्मनाक और एकतरफा हार ने भारतीय फुटबॉल की खोखली बुनियाद को पूरी तरह से नंगा कर दिया है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश की टीम का मैदान पर जो लचर, दिशाहीन और डरा हुआ प्रदर्शन दिखा, उसने 'स्लीपिंग जायंट' (सोते हुए शेर) के तमगे को एक भद्दा मजाक बनाकर रख दिया है।

इस ऐतिहासिक फजीहत के तुरंत बाद अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ने डैमेज कंट्रोल की नाकाम कोशिश करते हुए मुख्य कोच को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया है। इस विदेशी कोच के कार्यकाल और डिफेंसिव रणनीति को लेकर पिछले कई महीनों से सवाल उठ रहे थे, लेकिन महासंघ आंखों पर पट्टी बांधे बैठा था। खिलाड़ियों के बीच आपसी तालमेल की कमी, गलत रणनीतियों और फिटनेस के शर्मनाक स्तर ने इस हार की स्क्रिप्ट काफी पहले ही लिख दी थी।

दिग्गज स्ट्राइकर सुनील छेत्री के जाने के बाद भारतीय फॉरवर्ड लाइन पूरी तरह से अनाथ और बेदम नजर आ रही है। गोल करने की क्षमता तो दूर की बात है, टीम मैदान पर 90 मिनट तक गेंद को अपने पास रखने (पजेशन) के लिए भी हांफती हुई दिखी। ग्रासरूट लेवल (निचले स्तर) पर काम करने के महासंघ के करोड़ों के दावों की हवा इस एक मैच ने निकाल दी है, जहां भारतीय खिलाड़ी विपक्षी टीम के सामने तकनीकी और शारीरिक, दोनों ही पैमानों पर बेहद बौने साबित हुए।
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इस भयानक खेल त्रासदी के बाद अब खेल मंत्रालय ने सख्त रुख अपनाते हुए सीधे तौर पर एआईएफएफ (AIFF) से जवाब तलब किया है। लाखों डॉलर के विदेशी दौरों, एक्सपोजर कैंप्स और भारी-भरकम बजट के बावजूद नतीजे हमेशा सिफर क्यों रहते हैं, यह तीखा सवाल आज हर फैन पूछ रहा है। अगर अब भी भारतीय फुटबॉल के सफेदपोश कर्ताधर्ताओं की नींद नहीं खुली और सिस्टम की पूरी तरह से ओवरहॉलिंग नहीं की गई, तो भारतीय टीम जल्द ही एशियाई स्तर पर भी खेलने लायक नहीं बचेगी।