चंडीगढ़ के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह अब तक का सबसे विस्फोटक और साहसिक क्षण है, जब राजभवन से उठी एक बेबाक आवाज ने सीधे थाने और सचिवालय की दीवारों को हिलाकर रख दिया है। पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने किसी शिष्टाचार या कूटनीतिक औपचारिकता का पर्दा ओढ़े बिना, सीधे उस 'नेक्सस' की धज्जियां उड़ा दी हैं जिसे छूने से भी अमूमन हुक्मरान कतराते हैं। राज्यपाल का यह रौद्र रूप कोई सामान्य प्रशासनिक भाषण नहीं, बल्कि व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा अपने ही सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ जारी की गई एक खुली चार्जशीट है। उन्होंने बेहद तल्ख और धारदार लहजे में खाकी और सफेदपोशों को कटघरे में खड़ा करते हुए यह साफ ऐलान कर दिया है कि समाज की रगों में जहर घोल रहा नशे का यह काला साम्राज्य किसी अदृश्य ताकत के दम पर नहीं, बल्कि सीधे सिस्टम के वीआईपी संरक्षण और आंखें मूंदने की नीति के कारण फल-फूल रहा है। पढ़ें पूरी खबर विस्तार से।
व्यवस्था की नब्ज पर प्रहार: राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया का चंडीगढ़ में ऐतिहासिक और साहसिक संबोधन
चंडीगढ़ में आयोजित एक जन-समारोह के दौरान पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने नशे के बढ़ते साम्राज्य पर गहरी चिंता जताते हुए एक ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक अमले की नींद उड़ा दी है। अमूमन संवैधानिक पदों पर बैठे लोग नपे-तुले और कूटनीतिक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कटारिया ने किसी औपचारिकता की परवाह न करते हुए सीधे उस कड़वे सच पर चोट की है जिससे पूरी व्यवस्था अब तक कतराती रही है। उन्होंने साफ किया कि नशा सिर्फ एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहा एक गंभीर सामाजिक संकट है, जिसे उखाड़ने के लिए हुक्मरानों से लेकर आम जनता तक को आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है।

सिस्टम को सीधा अल्टीमेटम: "बिना पुलिस और सरकार की शह के 10 दिन भी नहीं चल सकता नशे का धंधा"
व्यवस्था के सबसे बड़े और संवेदनशील अंग पर सीधा निशाना साधते हुए राज्यपाल ने अपने पैंतालीस साल के लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन का हवाला दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वह वर्दी का पूरा सम्मान करते हैं और किसी को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते, लेकिन सच यही है कि नशे का यह काला कारोबार बिना सरकार के सहारे और बिना पुलिस के सहारे मात्र दस दिन भी नहीं चल सकता... दस दिन भी नहीं! राज्यपाल का यह तीखा प्रहार सीधे तौर पर उस नेक्सस को बेनकाब करता है, जिसकी मूक सहमति और कथित संलिप्तता के बिना ड्रग्स का इतना बड़ा नेटवर्क पनप ही नहीं सकता। उनके इस बयान ने सीधे तौर पर पुलिस और शासन-प्रशासन की जवाबदेही तय कर दी है।
जनप्रतिनिधियों की अंधता पर कड़ा तंज: "वार्ड की हलचल नहीं दिखती, तो काहे के जनप्रतिनिधि?"
प्रशासनिक अमले के बाद राज्यपाल कटारिया का अगला निशाना वो जनप्रतिनिधि थे जो चुनाव जीतकर बड़े-बड़े दावे तो करते हैं, लेकिन अपने ही क्षेत्र की जमीनी हकीकत से पूरी तरह बेखबर रहते हैं। उन्होंने पार्षदों और स्थानीय नेताओं को सीधे आड़े हाथों लेते हुए सवाल उठाया कि क्या आपके वार्ड में जो गतिविधि चल रही है, उससे आपको दिखता नहीं? ऐसा तो नहीं होता। उन्होंने कड़े लहजे में पूछा कि अगर आप जनप्रतिनिधि हो और आपकी आँखों के नीचे अपने वार्ड में हलचल नहीं दिखती है, तो आप काहे के जनप्रतिनिधि और किस चीज़ के जनप्रतिनिधि हैं? एक सजग पत्रकार के नजरिए से यह सवाल बेहद प्रासंगिक है क्योंकि जो नेता वोट मांगते समय हर गली-मोहल्ले की पल-पल की खबर रखने का दावा करते हैं, वे चुनाव जीतते ही अपने इलाके के अवैध अड्डों से अनजान बन जाते हैं।

सामाजिक पाखंड का पर्दाफाश: "भगत सिंह पैदा तो हो, लेकिन पड़ोसी के घर में..."
समाज के भीतर फैले दोहरे मापदंडों और पाखंड पर प्रहार करते हुए राज्यपाल ने एक बेहद मर्मस्पर्शी और कड़वा उदाहरण सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज हमारे समाज की मानसिकता ऐसी हो गई है कि हम सब देश में बदलाव के लिए 'भगत सिंह' की पैदाइश तो चाहते हैं, लेकिन हमारी इच्छा होती है कि वह भगत सिंह हमारे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी के घर में पैदा हो। कटारिया ने दो टूक शब्दों में नसीहत दी कि हमें दूसरों की तरफ उंगली उठाने की आदत छोड़कर खुद के भीतर झांकना होगा और यह सोचना होगा कि इस विभीषिका को मिटाने में मेरा निजी योगदान क्या हो सकता है, क्योंकि जिस दिन हर नागरिक इस जिम्मेदारी को अपना लेगा, उस दिन समस्या का समाधान तुरंत हो जाएगा।
नशे के समूल नाश का प्रैक्टिकल फॉर्मूला: 'विद्या के मंदिरों' से ही उखड़ेगी इस काले साम्राज्य की जड़
इस जानलेवा बीमारी से निपटने के लिए राज्यपाल ने कोई हवा-हवाई बात करने के बजाय एक बेहद व्यावहारिक और जमीनी फॉर्मूला भी दुनिया के सामने रखा, जो सीधे तौर पर हमारे शिक्षा तंत्र से जुड़ा है। उन्होंने गणित समझाते हुए कहा कि हर वार्ड में छोटे-बड़े स्कूलों को मिलाकर कम से कम साठ हजार से एक लाख तक बच्चे पढ़ते हैं, इसलिए जनप्रतिनिधियों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को पुलिस के भरोसे बैठने के बजाय खुद इन विद्यालयों में जाकर बच्चों से बात करनी चाहिए। कटारिया का यह सोचना बेहद सटीक है कि अगर नशे को जड़ से खत्म करना है तो इसकी शुरुआत केवल और केवल विद्या के मंदिरों यानी स्कूलों से ही हो सकती है, क्योंकि यदि हम आज से नए बच्चों को इस दलदल में गिरने से बचा लें, तो आने वाले दस वर्षों में नशे का यह पूरा अवैध नेटवर्क अपने आप दम तोड़ देगा।

बदलाव की अंतिम पुकार: नफरत बुराई से हो, इस दलदल में फंसे बीमारों से नहीं
लीक से हटकर दिए गए इस पूरे कड़े संबोधन में राज्यपाल ने अंत में एक बेहद मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण भी पेश किया, जो इस समस्या से निपटने की सही दिशा दिखाता है। उन्होंने कहा कि हमें इस सामाजिक बुराई से नफरत करने की बजाय, उस दलदल में फंसे इंसानों को बाहर निकालने का पूरी ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए, भले ही सफलता का पैमाना जो भी हो। सोशल मीडिया में वायरल वीडियो में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया का यह बेबाक अंदाज महज एक भाषण नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो यह साफ करती है कि जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और सामाजिक एकजुटता एक साथ नहीं आएंगे, तब तक नशामुक्त चंडीगढ़ और नशामुक्त भारत का निर्माण केवल कागजी दावा ही बनकर रह जाएगा।