कांगड़ा (टांडा)। हिमाचल प्रदेश में आधुनिक जीवनशैली, बदलते सामाजिक समीकरण और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती लापरवाही अब एक गंभीर संकट का रूप ले रही है। प्रदेश की महिलाओं में देर से शादी करने, पहली संतान की प्लानिंग को टालने और बच्चों को स्तनपान न करवाने की बढ़ती प्रवृत्ति उन्हें सीधे तौर पर स्तन कैंसर (ब्रेस्ट कैंसर) के जोखिम में धकेल रही है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांगड़ा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज टांडा के रेडियोथेरेपी एवं ऑन्कोलॉजी विभाग में हर साल स्तन कैंसर के करीब 350 नए मामले सामने आ रहे हैं। पहाड़ जैसे शांत और स्वच्छ माने जाने वाले राज्य में कैंसर के मरीजों का यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है और यह साफ संकेत दे रहा है कि जीवनशैली में आ रहा बदलाव महिलाओं की सेहत पर किस कदर भारी पड़ रहा है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में स्तन कैंसर का ग्राफ बढ़ने के पीछे केवल देर से मातृत्व और स्तनपान से परहेज ही नहीं, बल्कि कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं। बढ़ती उम्र, परिवार में पहले से किसी को कैंसर होने का इतिहास और आनुवंशिक कारण इस खतरे की बुनियाद रखते हैं। इसके साथ ही आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम की भारी कमी तथा तेजी से बढ़ता मोटापा इस बीमारी को और हवा दे रहा है। जब महिलाएं करियर या अन्य कारणों से पहले बच्चे के जन्म में अधिक देरी करती हैं और प्रसव के बाद शिशु को पर्याप्त स्तनपान नहीं करवातीं, तो शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव स्तन कैंसर की आशंका को कई गुना बढ़ा देते हैं।
दूसरी ओर, प्रदेश के पुरुषों की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। पुरुषों में धूम्रपान और तंबाकू उत्पादों का धड़ल्ले से हो रहा सेवन फेफड़ों, मुंह और गले के कैंसर का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बीड़ी-सिगरेट पीने से फेफड़ों की कार्यक्षमता नष्ट होती है और वहां कैंसर पनपने का खतरा सीधा बढ़ जाता है। वहीं, जो पुरुष तंबाकू के साथ-साथ शराब का भी सेवन करते हैं, उनके लिए यह लत एक जानलेवा कॉकटेल साबित हो रही है। शराब और तंबाकू का एक साथ सेवन मुंह और गले की कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाता है, जिससे इन अंगों में कैंसर होने की आशंका खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है।

कैंसर के इस बढ़ते प्रकोप पर चिंता जताते हुए टांडा मेडिकल कॉलेज के रेडियोथेरेपी एवं ऑन्कोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. पूर्वा व्यास ने स्पष्ट किया है कि इस जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए जीवनशैली में तुरंत और ठोस बदलाव करना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, कैंसर से सुरक्षित रहने की पहली शर्त तंबाकू, धूम्रपान और शराब से पूरी तरह दूरी बनाना है। इसके अलावा, अपने शरीर के वजन को नियंत्रित रखना, रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम को दिनचर्या का हिस्सा बनाना और संतुलित आहार लेना सबसे कारगर बचाव है। डॉ. व्यास सलाह देती हैं कि लोगों को अपनी रोजमर्रा की थाली में ताजी हरी सब्जियां, मौसमी फल और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों को प्रमुखता से शामिल करना चाहिए। साथ ही, समाज और स्वास्थ्य तंत्र को मिलकर नई माताओं को स्तनपान के प्रति प्रोत्साहित करना होगा और महिलाओं को स्तन कैंसर के जोखिम कारकों के प्रति समय रहते जागरूक करना होगा।
इस बीमारी से जंग जीतने में समय पर पहचान और तुरंत उपचार की भूमिका सबसे अहम है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि शरीर में दिखने वाले शुरुआती संकेतों को कतई नजरअंदाज न किया जाए। महिलाओं को यदि स्तन में किसी भी प्रकार की गांठ महसूस हो, स्तन के आकार में असामान्य बदलाव दिखे, निप्पल से खून या कोई अन्य असामान्य स्राव हो, अथवा स्तन की त्वचा में सिकुड़न या बदलाव नजर आए, तो बिना एक दिन गंवाए तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। विशेष रूप से 40 वर्ष की आयु पार कर चुकी महिलाओं को अपनी उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर डॉक्टर की सलाह से नियमित मैमोग्राफी और अन्य जरूरी जांच करवानी चाहिए। इसी तरह, पुरुषों में यदि लंबे समय तक खांसी बनी रहे, आवाज में अचानक भारीपन या बदलाव आ जाए, खाना निगलने में लगातार परेशानी हो या मुंह के भीतर कोई ऐसा छाला या घाव हो जो लंबे समय से भर न रहा हो, तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करवानी चाहिए।
वैश्विक स्तर पर सामने आए ताजा आंकड़े भी यही बताते हैं कि थोड़ी सी सतर्कता से इस बड़ी त्रासदी को टाला जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) द्वारा फरवरी 2026 में जारी किए गए वैश्विक विश्लेषण के अनुसार, दुनिया भर में सामने आने वाले कैंसर के करीब 37 प्रतिशत नए मामलों को पूरी तरह से रोका जा सकता है। इस अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भी तंबाकू, शराब, मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी और कैंसर पैदा करने वाले संक्रमणों को ही सबसे बड़ा लेकिन रोका जा सकने वाला जोखिम कारक माना गया है। साफ है कि कैंसर कोई ऐसी नियति नहीं है जिसे बदला न जा सके, बल्कि सही जागरूकता, खान-पान व दिनचर्या में सुधार और समय पर डॉक्टरी जांच के जरिए हिमाचल को इस गंभीर बीमारी के साये से काफी हद तक बचाया जा सकता है।