चेक बाउंस मुकदमों की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल खेलने वालों और लालच में आकर अदालत की आंखों में धूल झोंकने वालों के लिए यह खबर एक करारा कानूनी तमाचा है! हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि आंशिक भुगतान (Partial Payment) मिलने के बावजूद पुरानी पूरी रकम का चेक बैंक में लगाना न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि यह न्याय का घोर मजाक भी है। अगर आपने कुछ पैसा वसूलने के बाद भी पूरे अमाउंट का चेक बैंक में लगाने की चालाकी की, तो न सिर्फ आपका केस रद्दी की टोकरी में जाएगा, बल्कि कोर्ट को गुमराह करने की यह साजिश आपको ही भारी पड़ सकती है। यह फैसला उन तमाम निर्दोष लोगों के लिए एक मजबूत ढाल बनकर उभरा है, जिन्हें झूठे मुकदमों का खौफ दिखाकर प्रताड़ित किया जाता है।
चेक बाउंस केस : आंशिक भुगतान के बाद पूरा चेक लगाना गैरकानूनी, हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस राकेश कैंथला की पीठ ने 10 सितंबर 2026 को चेक बाउंस (Section 138 NI Act) के मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि यदि चेक जारी होने के बाद और उसे बैंक में प्रस्तुत किए जाने से पहले देनदार द्वारा कोई आंशिक (Partial) भुगतान कर दिया जाता है, तो शिकायतकर्ता पुरानी पूरी रकम का चेक बैंक में नहीं लगा सकता। ऐसा करना कानूनी रूप से अमान्य है और इसके आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
क्या था कुल्लू का पूरा मामला?
यह अहम फैसला कुल्लू जिले से जुड़े 'चेत राम बनाम रंजीत' (क्रिमिनल रिवीजन नंबर 627/2024) मामले की सुनवाई के दौरान आया है। मामले के साक्ष्यों के अनुसार, किरायेदार (आरोपी चेत राम) ने 29 अक्टूबर 2018 को कमरे के किराये और अन्य खर्चों की एवज में 1, 40, 000 रुपये का चेक जारी किया था। शिकायतकर्ता ने इस चेक को 23 जनवरी 2019 को बैंक में प्रस्तुत किया। लेकिन अदालत में यह साबित हुआ कि चेक बैंक में लगाने से काफी पहले, 29 नवंबर 2018 को ही आरोपी ने शिकायतकर्ता के बैंक खाते में 50, 000 रुपये ट्रांसफर कर दिए थे।
निचली अदालतों की भूल और हाईकोर्ट का कड़ा रुख
इस आंशिक भुगतान के बावजूद, शिकायतकर्ता ने 1, 40, 000 रुपये का पूरा चेक बैंक में लगा दिया। चेक बाउंस होने पर कुल्लू (मनाली) की ट्रायल कोर्ट और बाद में सत्र न्यायालय ने कानूनी बारीकियों की अनदेखी करते हुए आरोपी को पूरी राशि के लिए दोषी ठहराकर सजा सुना दी थी। जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस राकेश कैंथला ने निचली अदालतों के फैसले को सिरे से पलटते हुए आरोपी को तुरंत दोषमुक्त (बरी) कर दिया।
एनआई एक्ट की धारा 56 का कड़ाई से पालन
जस्टिस कैंथला ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों (विशेषकर दशरथभाई त्रिकमभाई पटेल मामले) का हवाला देते हुए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 56 के तहत कानूनी स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि जब 50, 000 रुपये का भुगतान हो चुका था, तो 'कानूनी देनदारी' (Legally Enforceable Debt) 1, 40, 000 रुपये नहीं रह गई थी। नियम यह है कि आंशिक भुगतान मिलने पर शिकायतकर्ता को चेक के पीछे उस भुगतान का स्पष्ट ब्यौरा (Endorsement) दर्ज करना चाहिए और केवल 'बची हुई शेष रकम' के लिए ही चेक को बैंक में लगाना चाहिए। घटी हुई राशि का जिक्र किए बिना पूरी रकम का लीगल नोटिस भेजना और केस करना पूरी तरह से दोषपूर्ण है।लालच और ब्लैकमेलिंग के लिए कोर्ट को गुमराह करने वालों पर हो सख्त कार्रवाई
इस ऐतिहासिक फैसले से एक बड़ा और गंभीर सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या ऐसे मामलों में केवल आरोपी को बरी कर देना ही न्याय के लिए पर्याप्त है? यदि कोई शिकायतकर्ता लालच में आकर या ब्लैकमेलिंग की नीयत से जानबूझकर आंशिक भुगतान का सच छिपाता है और पूरी राशि का चेक लगाकर झूठा मुकदमा ठोकता है, तो यह सीधे तौर पर अदालत को गुमराह करने और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का संगीन मामला है।
ऐसे मामलों में, अदालत को गुमराह करने (Perjury और Misleading the Court) के जुर्म में शिकायतकर्ताओं के खिलाफ भी कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। न्यायपालिका को ऐसी सख्त नजीर स्थापित करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी शातिर व्यक्ति कानून का मखौल उड़ाकर या अदालत की आंखों में धूल झोंककर किसी बेगुनाह को झूठी सजा दिलाने की जुर्रत न कर सके। पारदर्शी पत्रकारिता और जनहित के नजरिए से यह जरूरी है कि ऐसे झूठे मुकदमों पर लगाम कसी जाए।