केप टाउन/शिमला: दक्षिण अफ्रीका की विधायी राजधानी केप टाउन स्थित दक्षिण अफ्रीकी संसद में आयोजित 69वें राष्ट्रमण्डल संसदीय सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानियां ने विधि निर्माण के बाद कानूनों की समीक्षा को लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कानून बनाना विधायिका का अंतिम उद्देश्य नहीं है। किसी कानून की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होती है कि उसके लागू होने के बाद समाज और जनता के जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ा, उसके निर्धारित उद्देश्यों की कितनी पूर्ति हुई तथा उसके क्रियान्वयन में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
पठानियां सम्मेलन में निर्धारित “विधायी समीक्षा के बाद: संसद को जनता से जोड़ना” विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस सत्र में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण ने भी अपने विचार रखे।
कानून बनने के बाद प्रभाव का मूल्यांकन जरूरी
अपने संबोधन में पठानियां ने कहा कि पोस्ट-लेजिस्लेटिव स्क्रूटिनी (विधि निर्माण के बाद समीक्षा) का उद्देश्य किसी कानून के लागू होने के बाद उसके परिणामों का व्यवस्थित मूल्यांकन करना है। इसके तहत यह देखा जा सकता है कि कानून अपने मूल उद्देश्यों के अनुरूप कार्य कर रहा है या नहीं, उसके क्रियान्वयन में क्या बाधाएं आ रही हैं, प्रशासनिक संस्थाओं के पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं तथा कानून का नागरिकों पर वास्तविक प्रभाव क्या रहा है।

उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया से उन कमियों की पहचान की जा सकती है, जो कानून बनाते समय स्पष्ट नहीं हो पातीं। इससे आवश्यकता के अनुसार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और उसमें सुधार की दिशा भी निर्धारित की जा सकती है।
संसदीय समितियों की भूमिका अहम
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसदीय समितियां इस पूरी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। समितियां संबंधित मंत्रालयों और विभागों से आंकड़े एवं रिपोर्ट मांगने के साथ-साथ विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, नागरिक समाज, उद्योग जगत तथा प्रभावित नागरिकों के विचार भी सुन सकती हैं।
उन्होंने कहा कि इस तरह कानूनों की समीक्षा केवल सरकारी दस्तावेजों और आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जमीनी स्तर के अनुभवों और वास्तविक परिस्थितियों को भी इसमें शामिल किया जा सकेगा।

समीक्षा प्रक्रिया में जनता की भागीदारी जरूरी
पठानियां ने कहा कि कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़ी कठिनाइयों और सुझावों को संसदीय समितियों तक पहुंचाने के लिए नागरिकों के पास सरल और प्रभावी माध्यम होने चाहिए। श्रम, शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण और डिजिटल शासन जैसे क्षेत्रों से जुड़े कानूनों की समीक्षा में नागरिकों के अनुभव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने सार्वजनिक परामर्श को समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनाने पर जोर देते हुए कहा कि संसदीय समितियां लिखित सुझाव आमंत्रित करने, सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करने जैसी व्यवस्थाएं अपना सकती हैं।कानून बनना प्रक्रिया का अंत नहीं
पठानियां ने कहा कि पोस्ट-लेजिस्लेटिव स्क्रूटिनी लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कानून बनाना प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि उसके प्रभावों के मूल्यांकन की शुरुआत भी है। किसी कानून की सफलता का वास्तविक परीक्षण उसके क्रियान्वयन और जनता के जीवन में दिखाई देने वाले परिणामों से होता है।
उन्होंने कहा कि जनता के साथ निरंतर संवाद, विधायिका की सक्रिय निगरानी, संसदीय समितियों की प्रभावी भूमिका, विश्वसनीय आंकड़ों तथा आधुनिक तकनीक के उपयोग से कानूनों की समीक्षा प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

जनता केवल कानूनों की प्राप्तकर्ता नहीं
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि एक सशक्त लोकतंत्र वही है, जिसमें जनता केवल कानूनों की प्राप्तकर्ता न होकर उनके प्रभाव के मूल्यांकन और सुधार की प्रक्रिया में भी सहभागी बने।
उन्होंने कहा कि पोस्ट-लेजिस्लेटिव स्क्रूटिनी और जनता से निरंतर जुड़ाव मिलकर विधायी व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी, प्रभावी और नागरिक-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।