क्या देश में अब तीखे और असहज सवाल पूछना अपराध हो गया है? लोकतंत्र और प्रेस की आजादी की बात करने वाले राजनेता जब खुद सवालों के घेरे में आते हैं, तो वे किस तरह जवाबदेही से भागते हैं, इसका एक ताजा उदाहरण संसद भवन (संविधान सदन) के बाहर देखने को मिला। जब एक पत्रकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों का दर्द कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सामने रखना चाहा, तो उन्होंने संवेदनशीलता दिखाने या जवाब देने के बजाय, पलटकर पत्रकार की ही राजनीतिक निष्ठा पर सवाल खड़ा कर दिया। पत्रकार को 'बीजेपी का' बताकर सवाल को टालने का यह रवैया न सिर्फ प्रेस की स्वतंत्रता का अपमान है, बल्कि देश की सुरक्षा में तैनात जवानों के प्रति एक घोर असंवेदनशील दृष्टिकोण को भी उजागर करता है।
नई दिल्ली: (HD News); देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था संभालने वाले जवानों के दर्द पर राजनेता कितने संवेदनशील हैं? यह सवाल एक बार फिर तब खड़ा हो गया, जब संसद भवन (संविधान सदन) के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और एक पत्रकार के बीच हुआ संवाद विवादों के घेरे में आ गया। घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों से जुड़ा एक बेहद गंभीर और सीधा सवाल पूछे जाने पर राहुल गांधी ने न सिर्फ मुद्दे को टाल दिया, बल्कि सवाल पूछने वाले मीडियाकर्मी पर ही तंज कसते हुए पूछ लिया- "भैया, बीजेपी के हो क्या?"
इस घटना ने राजनीतिक गलियारों और मीडिया जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब असहज कर देने वाले हर सवाल का जवाब देने के बजाय पत्रकारों को राजनीतिक खेमों में बांट देना ही राजनेताओं का नया हथियार बन गया है?
कैमरे में कैद हुई 'जवाबदेही से भागने' की तस्वीर
वायरल हो रहे वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि राहुल गांधी अपनी गाड़ी से उतरकर संविधान सदन की ओर बढ़ रहे हैं। तभी एक पत्रकार उनसे पूछता है- "राहुल, जो पुलिस वाले घायल हुए थे, उनके परिवार वालों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है..."।
सवालों से भागे राहुल गांधी! पत्रकार से सरेआम बोले- "भैया, BJP के हो क्या?" - Video
पत्रकार अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता कि राहुल गांधी उसे बीच में ही टोकते हुए एक रक्षात्मक (Defensive) लेकिन आक्रामक रवैया अपनाते हैं। वे पत्रकार को खारिज करते हुए कहते हैं- "बीजेपी के हो क्या?" और बिना कोई जवाब दिए वहां से निकल जाते हैं। राहुल के इस रवैये से हैरान और आहत पत्रकार पीछे से कहता सुनाई देता है कि, "नहीं, मैं बीजेपी का नहीं हूं... बार-बार बीजेपी का बोल देने का क्या मतलब है सर? यह कोई तरीका नहीं है।"
पत्रकारों पर 'ठप्पा' लगाना: क्या यही है लोकतंत्र?
विपक्ष के एक कद्दावर नेता के तौर पर राहुल गांधी अक्सर सरकार से प्रेस की आजादी और जवाबदेही की मांग करते नजर आते हैं। लेकिन जब उनके सामने कोई ऐसा सवाल आता है जो शायद उनके नैरेटिव (विमर्श) के अनुकूल नहीं है, तो उनका यह रवैया कई सवाल खड़े करता है।
क्या लोकतंत्र में पत्रकार का काम सिर्फ राजनेताओं की हां में हां मिलाना है? अगर कोई पत्रकार तीखा सवाल पूछता है, तो क्या उसे सीधे तौर पर 'सत्ता पक्ष (बीजेपी) का एजेंट' करार दे दिया जाएगा? पत्रकारिता के जानकारों का मानना है कि 'मैसेन्जर' (संदेशवाहक) पर हमला करना असल में मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने (Evasive Behavior) की एक सोची-समझी रणनीति है।
घायल जवानों के प्रति संवेदनशीलता पर सीधा वार
यह पूरा विवाद सिर्फ एक पत्रकार के साथ हुए व्यवहार तक सीमित नहीं है। इसका दूसरा और ज्यादा गंभीर पहलू घायल पुलिसकर्मियों से जुड़ा है। जब देश की आंतरिक सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों के परिवार सामने आकर अपना दर्द बयां कर रहे हों, तब देश की सबसे पुरानी पार्टी के शीर्ष नेता से सहानुभूति और गंभीरता की अपेक्षा की जाती है।
लेकिन राहुल गांधी का एक तंज कसकर वहां से निकल जाना, उनके विरोधियों को यह कहने का खुला निमंत्रण दे रहा है कि कांग्रेस नेता के मन में पुलिस या सुरक्षाबलों के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि जवानों के बलिदान और संघर्षों को किसी भी राजनीतिक चश्मे से देखना एक परिपक्व राजनीति का हिस्सा नहीं हो सकता।
एक जीवंत लोकतंत्र में विपक्ष के किसी भी शीर्ष नेता की भूमिका केवल सत्ता पक्ष से सवाल पूछने तक सीमित नहीं होती, बल्कि जनता और मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों का संयम, गंभीरता और जिम्मेदारी से जवाब देना भी उसी लोकतंत्र का अहम हिस्सा है। असहज मुद्दों से बचने के लिए 'मैसेन्जर' (पत्रकार) पर हमला करना या उसे 'राजनीतिक एजेंट' करार देना एक बेहद अस्वस्थ और खतरनाक परंपरा को जन्म देता है। घायल जवानों और उनके परिवारों का मुद्दा किसी भी दलगत राजनीति से बहुत ऊपर है। ऐसे में, इस पर इस तरह का 'खारिज करने वाला' (Dismissive) रवैया अपनाना यह साबित करता है कि जब बात खुद की जवाबदेही की आती है, तो बड़े-बड़े लोकतांत्रिक दावे खोखले साबित होने लगते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer) - यह आलेख सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में प्रसारित हो रहे उस वीडियो क्लिप के विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी और एक पत्रकार के बीच संसद भवन के बाहर संवाद हुआ था। इसमें प्रस्तुत किए गए विचार, तर्क और निष्कर्ष घटना के दृश्य-अवलोकन और पत्रकारिता के सामान्य सिद्धांतों (निष्पक्षता और जवाबदेही) को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष की छवि को धूमिल करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में राजनेताओं के व्यवहार और मीडिया के प्रति उनके दृष्टिकोण का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है।