देश के सबसे सटीक चुनावी अनुमानों के लिए मशहूर 'एक्सिस माई इंडिया' के फाउंडर और दिग्गज चुनाव विश्लेषक प्रदीप गुप्ता की एक ताजा भविष्यवाणी ने देश के सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है। गुप्ता ने साफ शब्दों में दावा किया है कि भारतीय राजनीति में एक बार फिर आजादी के बाद वाले 'कांग्रेस युग' की तरह एकतरफा दबदबे का दौर लौट आया है, जिसे भेद पाना फिलहाल विपक्ष के लिए टेढ़ी खीर है। उनके मुताबिक, साल 2014 से शुरू हुआ बीजेपी के राजनीतिक वर्चस्व का यह सफर एक पीढ़ी के राजनीतिक चक्र के नियम के तहत कम से कम 20 साल (यानी न्यूनतम वर्ष 2034) तक लगातार चल सकता है, बशर्ते बीजेपी के अपने गवर्नेंस में कोई बड़ी गिरावट न आए। पढ़ें विस्तार से..
नई दिल्ली: (HD News); भारतीय राजनीति में इस समय सबसे बड़ा और प्रासंगिक सवाल यही तैर रहा है कि केंद्र की सत्ता पर मजबूत पकड़ बना चुकी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कब और कैसे चुनौती दी जा सकती है। इस बीच, देश के जाने-माने चुनाव विश्लेषक और 'एक्सिस माई इंडिया' (Axis My India) के संस्थापक प्रदीप गुप्ता की एक ताजा भविष्यवाणी ने देश के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। हाल ही में तमिलनाडु चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी 'टीवीके' (TVK) के प्रदर्शन का सटीक अनुमान लगाकर चर्चा में रहे गुप्ता का मानना है कि फिलहाल विपक्ष के लिए बीजेपी को सत्ता से बेदखल करना एक बेहद 'टेढ़ी खीर' साबित होने वाला है।

भारतीय राजनीति में लौटा 'एकतरफा दबदबे' का दौर
प्रदीप गुप्ता के विश्लेषण के अनुसार, भारतीय राजनीति में एक बार फिर 'एकतरफा दबदबे' का वह दौर लौट आया है, जैसा आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस का हुआ करता था। उनका तर्क है कि लोकतांत्रिक राजनीति में एक पीढ़ी का वैचारिक और राजनीतिक चक्र आमतौर पर करीब 20 साल का होता है। इस लिहाज से, साल 2014 से शुरू हुआ बीजेपी के राजनीतिक वर्चस्व का यह सफर कम से कम दो दशकों (यानी न्यूनतम वर्ष 2034) तक लगातार जारी रह सकता है। गुप्ता के मुताबिक, जब तक बीजेपी की गवर्नेंस और काम की गुणवत्ता में कोई बड़ी गिरावट नहीं आती, तब तक उसे केंद्र की सत्ता से हटाना लगभग नामुमकिन जैसा है।
बीजेपी के लिए चुनौती: अब 'गुड' नहीं, 'सुपर परफॉर्मेंस' की जरूरत
इस बड़ी भविष्यवाणी के साथ ही चुनाव पंडित ने सत्ताधारी दल को एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लगातार मिल रहे भारी जनादेश के कारण अब सरकार से जनता की उम्मीदें आसमान छू रही हैं। राजनीति का यह शाश्वत नियम है कि कोई दल जितने ऊंचे मुकाम पर पहुंचता है, वहां से नीचे गिरने का जोखिम भी उतना ही बढ़ जाता है। ऐसे में बीजेपी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को सत्ता में बने रहने के लिए सिर्फ सामान्य तौर पर अच्छा काम (Good Governance) नहीं, बल्कि 'सुपर परफॉर्मेंस' दिखानी होगी। जब तक सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता की नजरों में मजबूत रहेगा, तब तक विपक्ष की चुनावी रणनीतियां नाकाम होती रहेंगी।

कांग्रेस की वापसी की राह में 'अतीत का बोझ' और समय की चुनौती
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर बात करते हुए प्रदीप गुप्ता ने कहा कि पार्टी आज भी अपने 'पुराने ढर्रे और अतीत की गलतियों' के बोझ तले दबी हुई है। पिछली सरकारों के दौरान बनी छवि को जनता के दिमाग से पूरी तरह साफ करने में कांग्रेस को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। उन्होंने गणितीय विश्लेषण देते हुए कहा कि अगले लोकसभा चुनाव (वर्ष 2029) तक कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर रहे 15 साल हो जाएंगे।
"पूरे देश के मतदाताओं का भरोसा दोबारा जीतने और उन्हें अपनी नीतियों के प्रति आश्वस्त करने के लिए कांग्रेस को अभी कम से कम 5 साल और जमीन पर कड़ी मेहनत करनी होगी। इसके बाद ही वह बीजेपी को सीधी और प्रभावी टक्कर देने की स्थिति में आ पाएगी।" - प्रदीप गुप्ता, फाउंडर, एक्सिस माई इंडिया

इस पूरे चुनावी विश्लेषण का लब्बोलुआब यह है कि भारतीय मतदाता इस समय मजबूत नेतृत्व और जमीनी गवर्नेंस को प्राथमिकता दे रहा है। बीजेपी का सुदृढ़ संगठन और चुनावी मशीनरी फिलहाल विपक्ष के मुकाबले कहीं अधिक सक्रिय है। प्रदीप गुप्ता के इस आकलन से साफ है कि आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर रहे 15 साल हो जाएंगे, लेकिन पूर्ण वापसी के लिए उसे अगले 5 साल जमीन पर कड़ी मशक्कत करनी होगी। सत्ता परिवर्तन तभी संभव है जब विपक्ष कोई ठोस वैकल्पिक एजेंडा दे या फिर बीजेपी अति-आत्मविश्वास में आकर अपनी 'सुपर परफॉर्मेंस' के ग्राफ को नीचे गिरा ले।
Disclaimer: यह समाचार प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक प्रदीप गुप्ता द्वारा दिए गए हालिया बयानों और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त किए गए विचार और अनुमान उनके व्यक्तिगत व संस्थागत अध्ययन का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाना नहीं, बल्कि केवल राजनैतिक विमर्श को पाठकों तक पहुंचाना है।