शक्ति की उपासना और भक्ति के महापर्व 'शारदीय नवरात्र' को लेकर देवभूमि हिमाचल प्रदेश में उल्लास का माहौल है। इस वर्ष 11 अक्तूबर (रविवार) से शुरू हो रहे नवरात्र में मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर पधार रही हैं, जिसे ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं में अच्छी वर्षा, कृषि में उन्नति और प्रदेश में खुशहाली का अत्यंत शुभ संकेत माना जा रहा है। 19 अक्तूबर को महाअष्टमी व नवमी के विशेष संयोग और 20 अक्तूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होने वाले इस नौ दिवसीय अनुष्ठान को लेकर शिमला सहित प्रदेश के सभी प्रमुख शक्तिपीठों और मंदिरों में तैयारियां जोरों पर हैं। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: शक्ति की अराधना और भक्ति के महापर्व 'शारदीय नवरात्र' को लेकर देवभूमि हिमाचल प्रदेश में तैयारियां जोरों पर हैं। आगामी 11 अक्तूबर (रविवार) से शुरू होने वाले इस नौ दिवसीय अनुष्ठान को लेकर शक्तिपीठों, स्थानीय मंदिरों से लेकर घरों तक असीम उत्साह का माहौल है। इस वर्ष नवरात्र का समापन 20 अक्तूबर को विजयादशमी के पावन पर्व के साथ होगा। प्रदेश भर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना के मद्देनजर प्रशासन और मंदिर समितियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं।

हाथी पर माता का आगमन, सुख-समृद्धि का शुभ संकेत
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत रविवार से हो रही है। शास्त्रों में वर्णित है कि जब नवरात्र रविवार या सोमवार से प्रारंभ होते हैं, तो मां दुर्गा का वाहन 'हाथी' होता है। माता का हाथी पर सवार होकर आना कृषि और आम जनमानस के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इसे प्रचुर वर्षा, धन-धान्य की वृद्धि, और प्रदेश में सुख-समृद्धि व खुशहाली का परिचायक माना गया है। विद्वानों के अनुसार, यह प्रकृति और मानव जीवन के लिए एक सकारात्मक शुरुआत का संकेत है।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और मां शैलपुत्री की आराधना
नवरात्र के पहले दिन 11 अक्तूबर को प्रतिपदा तिथि पर विधि-विधान से कलश स्थापना (घटस्थापना) की जाएगी और मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप 'शैलपुत्री' की पूजा होगी। शिमला के गंज बाजार स्थित ऐतिहासिक राधा-कृष्ण मंदिर के मुख्य पुजारी उमेश चंद्र नौटियाल के अनुसार, कलश स्थापना के लिए प्रातः 7:50 बजे से 10:00 बजे तक का समय सबसे उत्तम रहेगा। इसके अतिरिक्त, जो श्रद्धालु सुबह के समय घटस्थापना न कर सकें, वे दोपहर 11:45 से 12:31 बजे तक रहने वाले 'अभिजीत मुहूर्त' में भी यह शुभ कार्य संपन्न कर सकते हैं।
अष्टमी-नवमी का विशेष संयोग और माता की विदाई
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष नवरात्र की तिथियों में एक विशेष संयोग भी बन रहा है। 19 अक्तूबर को महाअष्टमी और महानवमी दोनों एक ही दिन पड़ रही हैं। इस दिन मां महागौरी की पूजा के साथ-साथ घरों व मंदिरों में कन्या पूजन और विशाल हवन-अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन नवरात्र के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक रहेगा। इसके अगले दिन, 20 अक्तूबर (मंगलवार) को 'विजयादशमी' (दशहरा) मनाया जाएगा। मंगलवार के दिन विजयादशमी होने के कारण माता का प्रस्थान 'घोड़े' पर माना जा रहा है, जिसे ज्योतिषीय दृष्टि से विभिन्न बदलावों का सूचक माना जाता है।

शक्तिपीठों में सजेगा दरबार, नौ दिन गूंजेंगे माता के जयकारे
नवरात्र शुरू होते ही हिमाचल प्रदेश के प्रमुख शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में रौनक कई गुना बढ़ जाएगी। पूरे नौ दिनों तक प्रदेश भर के मंदिरों में भजन-कीर्तन, जागरण और विशेष पूजा-अर्चना का दौर चलेगा। शिमला सहित प्रदेश के अन्य जिलों में मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जा रहा है। श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखकर मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की आराधना करेंगे, जिससे पूरी देवभूमि एक बार फिर भक्ति के रंग में रंगी नजर आएगी।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई तिथियों, घटस्थापना के शुभ मुहूर्त और मां दुर्गा के वाहन (हाथी और घोड़े) से जुड़े शुभ-अशुभ फलों की जानकारी पंचांग, सामान्य धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। माता के वाहन से अच्छी बारिश या सुख-समृद्धि का आकलन आस्था का विषय है, इसे किसी वैज्ञानिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी विशेष अनुष्ठान या मुहूर्त के सटीक समय के लिए कृपया अपने स्थानीय पंडित या योग्य ज्योतिषाचार्य से मार्गदर्शन अवश्य लें।