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हिमाचल: लाहौल की घेपन झील पर लगा देश का पहला 'अर्ली वार्निंग सिस्टम', अब टलेगा ग्लेशियर फटने का खतरा

October 16, 2026 10:13 AM
Om Prakash Thakur

लाहौल-स्पीति/शिमला: हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे के बीच हिमाचल प्रदेश ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। नेपाल जैसी भयावह जनहानि और तबाही से बचने के लिए लाहौल-स्पीति जिले की 4, 100 मीटर ऊंची घेपन झील पर भारत का पहला 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' (प्रारंभिक चेतावनी तंत्र) स्थापित कर दिया गया है। यह अत्याधुनिक प्रणाली ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियर की झीलों के फटने से आने वाली अचानक बाढ़ की पूर्व चेतावनी देगी, जिससे समय रहते बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान रोका जा सकेगा।

बढ़ते खतरे के बीच जागीं एजेंसियां, 173% बढ़ा है झील का दायरा

लाहौल घाटी में सिस्सु के ऊपर स्थित घेपन झील तक पहुंचने के लिए करीब 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है। बीते 40 वर्षों में इस झील का आकार करीब 173 फीसदी तक बढ़ चुका है, जो एक बड़े खतरे का संकेत है। नवंबर 2023 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने भी झील के बढ़ते क्षेत्रफल को लेकर प्रशासन को अलर्ट किया था। इसके बाद डीसी एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना ने खुद मौके का जायजा लिया और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ मिलकर यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की कवायद तेज कर दी। प्रशासन ने चंद्रा–चिनाब (चंद्रभागा) नदी के आसपास के उन इलाकों को भी चिह्नित किया है, जहां बाढ़ का सबसे अधिक खतरा है।

सुपरकंप्यूटर से जुड़ा है तंत्र, ऐसे करेगा काम

सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा स्थापित यह सिस्टम NDMA की एक पायलट परियोजना का हिस्सा है। इस हाई-टेक प्रणाली में बुआय-आधारित (Buoy-based) झील निगरानी स्टेशन, स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) और ग्लेशियर विजन यूनिट शामिल हैं।

  • रियल-टाइम निगरानी: ये उपकरण झील के जलस्तर और आसपास के पर्यावरणीय बदलावों पर 24 घंटे नज़र रखेंगे।
  • सुपरकंप्यूटर से विश्लेषण: सेंसर का डेटा, विजुअल्स और कम्प्यूटेशनल मॉडल सीधे C-DAC के सुपरकंप्यूटर प्लेटफॉर्म से जुड़ेंगे।
  • ऑटोमैटिक अलर्ट: जलस्तर निर्धारित मानकों से ऊपर जाते ही सिस्टम रियल-टाइम अलर्ट जारी करेगा और बाढ़ के जोखिम का सटीक आकलन कर आपदा प्रबंधन टीमों को सूचित करेगा।

दुर्गम पहाड़ियों पर साझा प्रयासों से मिली कामयाबी

14 किलोमीटर के दुर्गम और कठिन पहाड़ी रास्तों तथा पल-पल बदलते मौसम के बीच इस भारी-भरकम सिस्टम को स्थापित करना एक बड़ी चुनौती थी। जिला प्रशासन की प्रशासनिक व लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA), अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण संस्थान, NDRF, पुलिस और चिकित्सा दलों के समन्वित प्रयासों से ही इस जटिल मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सका। यह सिस्टम भविष्य में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को नई दिशा देगा।

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