कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला धनतेरस हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। देशभर में श्रद्धालु सुख-समृद्धि, आरोग्य और खुशहाली की कामना के साथ धनतेरस का पर्व मना रहे हैं। जानिए इस पर्व का धार्मिक महत्व, पूजा परंपरा और विशेष मान्यताएं।
देशभर में आज 6 नवंबर को धनतेरस का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत धनतेरस से मानी जाती है। इस अवसर पर बाजारों में खरीदारी और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां की जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धनतेरस का संबंध समुद्र मंथन से है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करके परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है।
धनतेरस के अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का भी विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार लोग सोना, चांदी, बर्तन और अन्य शुभ वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। शाम के समय घरों में दीपक जलाए जाते हैं और भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी तथा कुबेर देव से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

इस दिन यमदीपदान की भी विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाने से परिवार को अकाल मृत्यु के भय से सुरक्षा प्राप्त होती है। हालांकि यह धार्मिक आस्था से जुड़ी मान्यता है। धनतेरस का पर्व हमें आरोग्य, सद्भाव और परिवार की खुशहाली का संदेश देता है।
