हिमाचल प्रदेश को उसके हक का न्याय दिलाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा के साथ चले आ रहे दशकों पुराने भाखड़ा-नंगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं के बिजली विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश के 7.19% हिस्से की बिजली देनदारी के लिए एक 'कैशलेस सेटलमेंट' (नकद रहित समझौता) को मंजूरी दे दी है।
न्यायालय के इस दूरगामी फैसले के तहत हिमाचल प्रदेश को अब पंजाब और हरियाणा से नकद राशि के बजाय कुल 11, 973 मिलियन यूनिट (MUs) बिजली दी जाएगी। यह बिजली राज्य को आगामी 20 वर्षों की अवधि में निरंतर रूप से हस्तांतरित की जाएगी। इस निर्णय से प्रदेश सरकार की ऊर्जा संबंधी जरूरतें पूरी होंगी और राज्य के खजाने पर पड़ रहा वित्तीय दबाव भी काफी हद तक कम हो जाएगा।

यह विवाद सत्तर के दशक से चला आ रहा था, जिसमें हिमाचल प्रदेश लगातार अपनी हिस्सेदारी का दावा कर रहा था। साल 2011 में अदालत ने राज्य के हक में फैसला तो सुनाया था, लेकिन पंजाब और हरियाणा द्वारा इस पर अमल न किए जाने और नकद भुगतान की राशि को लेकर पेंच फंसे होने के कारण यह केवल कागजों पर ही सिमट कर रह गया था। अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अंततः तीनों राज्यों के बीच यह समझौता धरातल पर उतरा है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है। उन्होंने इसे हिमाचल प्रदेश के अधिकारों और यहां की जनता के हितों की एक बहुत बड़ी जीत करार दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस बिजली से राज्य को अपनी औद्योगिक इकाइयों को निर्बाध बिजली देने में मदद मिलेगी, जिससे राज्य के राजस्व और विकास को नई गति मिलेगी।
पंजाब और हरियाणा सरकारों को अब कोर्ट के आदेशानुसार एक तय समय-सारणी के भीतर इस विद्युत आपूर्ति को सुनिश्चित करना होगा। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) इस पूरे हस्तांतरण की निगरानी करेगा। राज्य के बुद्धिजीवियों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल हिमाचल के वित्तीय भविष्य को सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि अंतर-राज्यीय संबंधों में भी एक नया मील का पत्थर साबित होगा।