"हिमाचल प्रदेश की आबोहवा में अब महंगाई का 'सीमेंटेड जहर' घुलने लगा है। प्रदेश की जनता, जो पहले से ही आर्थिक बोझ तले दबी है, उसके लिए नया साल एक नई मुसीबत लेकर आया है। राज्य के संसाधनों से फलने-फूलने वाली सीमेंट कंपनियों ने एक बार फिर अपनी मनमानी का परिचय देते हुए कीमतों में ₹10 प्रति बैग का इजाफा कर दिया है। यह बढ़ोतरी न केवल तर्कहीन है, बल्कि उस आम आदमी के 'अपने घर' के सपने पर करारा प्रहार है, जो पाई-पाई जोड़कर अपने आशियाने की नींव रख रहा है। 'हिमदर्शन' की इस विशेष पड़ताल में देखिए कि कैसे बिना किसी लागत वृद्धि के कंपनियों ने जनता की जेब पर डाका डालने की तैयारी कर ली है।" पढ़ें विस्तार से..
शिमला/सोलन: (HD News); हिमाचल प्रदेश में निर्माण कार्यों पर एक बार फिर महंगाई का ग्रहण लग गया है। प्रदेश में सक्रिय दिग्गज सीमेंट कंपनियों ने एक बार फिर अपनी मनमानी दिखाते हुए सीमेंट के दामों में प्रति बोरी ₹10 की भारी वृद्धि कर दी है। कंपनियों का यह फैसला उस वक्त आया है जब प्रदेश की जनता पहले ही आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। 'हिमदर्शन' की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़िए कि कैसे यह बढ़ोतरी तर्कहीन है और इसके पीछे की असली कहानी क्या है।
लागत स्थिर, फिर भी दाम में 'आग' क्यों ?
इस बढ़ोतरी का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि पिछले चार महीनों से प्रदेश में न तो पेट्रोल-डीजल के दामों में कोई बड़ा उछाल आया है और न ही माल ढुलाई (Freight Charges) की दरों में कोई वृद्धि दर्ज की गई है। आमतौर पर कंपनियां कच्चे माल या ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ने का रोना रोकर दाम बढ़ाती हैं, लेकिन इस बार उनके पास कोई ठोस बहाना तक नहीं है। बिना किसी कारण के सीधे ₹10 बढ़ा देना, प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं की जेब पर सीधे तौर पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' जैसा है।

GST की राहत का 'मजाक' बनाती कंपनियां -
याद रहे कि कुछ समय पहले जब केंद्र सरकार ने जीएसटी (GST) दरों के जरिए सीमेंट के दामों में राहत देने की कोशिश की थी, तब जनता ने उम्मीद जताई थी कि अब घर बनाना सस्ता होगा। लेकिन विडंबना देखिए, जीएसटी में कमी के बाद जो दाम घटे थे, कंपनियों ने उन्हें किश्तों में बढ़ाकर न केवल उस राहत को खत्म कर दिया, बल्कि अब कीमतें पहले से भी ऊंचे स्तर पर ले आई हैं। यह साफ दर्शाता है कि सरकारी राहत का लाभ आम आदमी तक पहुँचने के बजाय कंपनियों के मुनाफे (Profit Margin) में तब्दील हो रहा है।
विपक्ष का 'चुनावी शोर' और सत्ता की 'चुप्पी' -
हिमाचल की राजनीति में सीमेंट का मुद्दा हमेशा से गरम रहा है। सत्ता के गलियारों में यह एक कड़वा सच है कि जो दल विपक्ष में होता है, वह सीमेंट की कीमतों को लेकर सड़कों पर उतरता है, विधानसभा में शोर मचाता है और इसे 'बड़ा घोटाला' करार देता है। लेकिन वही नेता जब सत्ता की कुर्सी पर बैठते हैं, तो उनकी आवाज़ मानों कंपनियों के कॉर्पोरेट ऑफिसों के दबाव में दब जाती है। सत्ता में आते ही जनता की तकलीफों को भूल जाना और कंपनियों को खुली छूट देना, अब हिमाचल की राजनीतिक परिपाटी बन चुकी है।

आम आदमी का टूटता सपना और 5 साल का हिसाब-
एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी एक अदद छत बनाने में लगा देता है। सीमेंट, सरिया और रेत के बढ़ते दाम उस सपने को हर दिन दूर धकेल रहे हैं। कंपनियों को शायद यह मुगालता है कि जनता मजबूर है, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिमाचल की जनता जितनी शांत है, उतनी ही समझदार भी है। जनता हर बढ़ोतरी, हर धोखे और हर चुप्पी को याद रखती है। नेताओं के लिए यह सबक है कि भले ही आज विरोध न दिख रहा हो, लेकिन जनता 'हिसाब बराबर' करने के लिए पांच साल का इंतज़ार करती है और वोट की चोट से अपनी ताकत का अहसास कराती है।
हिमदर्शन समाचार का सवाल: आखिर कब तक ?
हिमाचल प्रदेश को 'सीमेंट स्टेट' कहा जाता है। यहाँ के पहाड़ कंपनियों के लिए कच्चे माल का भंडार हैं, यहाँ के संसाधन इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन यहाँ के लोगों को ही पड़ोसी राज्यों (पंजाब-हरियाणा) से महंगा सीमेंट मिल रहा है। 'हिमदर्शन समाचार' (HD News) सरकार से यह सवाल पूछता है कि क्या सीमेंट कंपनियों की इस खुली लूट पर लगाम कसने वाला कोई नहीं है? क्या जनहित से ऊपर कंपनियों का मुनाफा हो गया है?

"कुल मिलाकर, सीमेंट के दामों में हुई यह ₹10 की बढ़ोतरी केवल एक आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि हिमाचल की जनता के साथ किया गया एक भद्दा मज़ाक है। जिस राज्य की छाती चीरकर ये कंपनियां अरबों का मुनाफा कूट रही हैं, उसी राज्य के बेटे-बेटियों को अपने सिर पर छत नसीब करने के लिए पड़ोसी राज्यों से भी ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। सत्ता और विपक्ष के बीच चल रही यह 'नूरा-कुश्ती' अब जनता की समझ में आने लगी है। सरकार की चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या वादे केवल चुनाव जीतने के लिए थे? कंपनियां अपनी मनमानी कर लें, और नेता अपनी आँखें मूंद लें, लेकिन याद रहे पहाड़ की जनता जितनी भोली है, उतनी ही स्वाभिमानी भी। जब 'वोट की चोट' पड़ेगी, तब कंपनियों का मुनाफा और नेताओं का अहंकार दोनों धराशायी होंगे। अब वक्त आ गया है कि जनता की अदालत में इस लूट का हिसाब माँगा जाए।"