क्या हम एक ऐसी पीढ़ी की ओर बढ़ रहे हैं जो बाहर से फौलाद दिखती है, लेकिन भीतर से कांच की तरह टूट रही है? बीते कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर जिम में कसरत करते, शादी में थिरकते या चलते-फिरते अचानक जमीन पर गिरकर दम तोड़ते युवाओं के वीडियो ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिसे अब तक हम 'किस्मत का खेल' या 'कोविड वैक्सीन का साइड इफेक्ट' मानकर चर्चा कर रहे थे, देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने उस पर से पर्दा उठा दिया है। एम्स की यह ताजा रिसर्च न केवल वैज्ञानिक तथ्यों के साथ अफवाहों का खंडन करती है, बल्कि भारतीय युवाओं के शरीर में 'चुपचाप' घर कर रही बीमारियों के प्रति एक गंभीर चेतावनी भी देती है। यह रिपोर्ट उस कड़वे सच को उजागर करती है जिसे हम अक्सर 'फिटनेस' के शोर में अनसुना कर देते हैं। पढ़ें विस्तार से.
नई दिल्ली/शिमला: बीते कुछ समय से देश में 20 से 40 वर्ष के स्वस्थ दिखने वाले युवाओं की अचानक मौतों ने पूरे समाज को हिला कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल होते जिम में गिरते युवाओं या शादी में नाचते हुए दम तोड़ते लोगों के वीडियो ने एक गहरा डर पैदा कर दिया था। इस डर के बीच अक्सर 'कोविड वैक्सीन' को कटघरे में खड़ा किया गया। लेकिन, देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की ताजा रिसर्च ने इस गुत्थी को सुलझाते हुए एक डरावने सच से पर्दा उठाया है। यह रिपोर्ट बताती है कि मौत अब उम्र की मोहताज नहीं रही और जिसे हम 'किस्मत' मान रहे थे, वह दरअसल हमारे शरीर के भीतर पलता एक 'साइलेंट किलर' है।

वैक्सीन का भ्रम टूटा, हृदय रोगों ने दी दस्तक
अक्सर इंटरनेट पर इन आकस्मिक मौतों के लिए कोविड-19 टीकाकरण को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। हालांकि, एम्स की रिसर्च ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि टीकाकरण और अचानक होने वाली मौतों के बीच कोई वैज्ञानिक कड़ी नहीं मिली है। असली गुनहगार हमारे शरीर के भीतर बिना किसी लक्षण के पनप रही बीमारियां और जेनेटिक कारण हैं। अध्ययन में पाया गया कि युवाओं की अचानक मौत का सबसे बड़ा कारण कोविड वैक्सीन नहीं, बल्कि 'कोरोनरी आर्टरी डिजीज' (हृदय रोग) है। कई मामलों में 20-25 साल के युवाओं की हृदय धमनियों में 70 प्रतिशत से अधिक ब्लॉकेज पाया गया, जिससे वे खुद भी पूरी तरह अनजान थे।
एम्स का डेटा: युवाओं पर सबसे बड़ा प्रहार
एम्स के फॉरेंसिक और पैथोलॉजी विभाग द्वारा मई 2023 से अप्रैल 2024 के बीच किए गए 2, 214 पोस्टमॉर्टम के विश्लेषण ने चिकित्सा जगत को चौंका दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, कुल आकस्मिक मौतों में से 57.2 प्रतिशत मामले 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के थे। सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि जिन युवाओं को उनके परिवार और दोस्त 'पूरी तरह फिट' समझ रहे थे, मेडिकल जांच में उनकी अंदरूनी बीमारियां मौत की असल वजह बनकर उभरीं। लगभग 42.6 प्रतिशत मौतों का सीधा संबंध दिल की गंभीर बीमारियों से था, जो चुपचाप शरीर को खोखला कर रही थीं।

'नेगेटिव ऑटोप्सी': जब शरीर पर नहीं मिलता कोई निशान
इस शोध का सबसे डरावना और चुनौतीपूर्ण पहलू 'नेगेटिव ऑटोप्सी' है। रिसर्च के दौरान हर पांचवें मामले (21.3%) में डॉक्टरों को शरीर के किसी भी अंग में प्रत्यक्ष खराबी या घाव नहीं मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि ये मौतें हृदय की विद्युत तरंगों (रिदम) में अचानक आए बिगाड़ के कारण हुईं। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे 'कार्डियक एरिथमिया' कहा जाता है, जो पलक झपकते ही जान ले लेता है और मौत के बाद शरीर पर कोई भौतिक निशान नहीं छोड़ता। यह तथ्य साबित करता है कि फिट दिखना और स्वस्थ होना, दो अलग-अलग बातें हैं।
केवल हृदय ही नहीं, अन्य बीमारियां भी दे रही हैं जानलेवा संकेत
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अचानक मौतों के लिए केवल दिल ही जिम्मेदार नहीं है। लगभग 21.3 प्रतिशत मौतें श्वसन रोगों जैसे निमोनिया और टीबी के कारण हुईं, जिनका सही समय पर इलाज नहीं कराया गया था। इसके अलावा, जीवनशैली से जुड़ी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो रही है। शराब के नशे में नींद के दौरान उल्टी का श्वसन नली में फंसना (Aspiration) भी कई युवाओं की मौत की वजह बना। वहीं, महिलाओं के मामलों में इंटरनल ब्लीडिंग और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं भी अचानक होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आई हैं।

कब और कहां है सबसे ज्यादा खतरा?
एम्स की यह रिसर्च सचेत करती है कि मौत का जोखिम किसी खास जगह या गतिविधि तक सीमित नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, 55 प्रतिशत से अधिक मौतें घर के सुरक्षित माहौल में हुईं, जबकि 30 प्रतिशत मामले यात्रा के दौरान सामने आए। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 40 प्रतिशत मौतें रात के सन्नाटे या तड़के सुबह दर्ज की गईं। विशेषज्ञों की सलाह है कि 'साइलेंट किलर' से बचने का एकमात्र तरीका नियमित हेल्थ चेकअप, नशीले पदार्थों से दूरी और अपने परिवार की मेडिकल हिस्ट्री के प्रति जागरूकता है।
एम्स की यह विस्तृत रिपोर्ट किसी डरावनी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि वह हकीकत है जिसे अब स्वीकार करना ही होगा। रिसर्च ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 'फिट' दिखने और 'स्वस्थ' होने के बीच एक बहुत महीन लकीर है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। 20 से 40 साल की उम्र में धमनियों के भीतर पनपता 70% ब्लॉकेज हमारी बदलती जीवनशैली, तनाव और नियमित स्वास्थ्य जांच के प्रति लापरवाही का प्रमाण है। अब समय सोशल मीडिया की अफवाहों पर यकीन करने का नहीं, बल्कि विज्ञान की इस चेतावनी को सुनने का है। नियमित कार्डियक चेकअप, संतुलित आहार और नशे से दूरी ही इस 'साइलेंट किलर' से बचने का एकमात्र ढाल है। याद रखिए, जागरूकता ही जीवन का आधार है।
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