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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सिर्फ 'गाली' देने मात्र से नहीं लगेगा SC/ST एक्ट, जाति के आधार पर अपमान की मंशा साबित करना अनिवार्य

January 20, 2026 11:06 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर
Om Prakash Thakur

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल अपशब्दों या गाली-गलौज का प्रयोग करना स्वतः ही SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाता, जब तक कि इसके पीछे जाति के आधार पर अपमानित करने की 'स्पष्ट मंशा' साबित न हो। अदालत का यह निर्णय कानून के वास्तविक उद्देश्यों की रक्षा करने और इसके संभावित दुरुपयोग के बीच एक संवैधानिक संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया है कि इस कठोर कानून की धाराएं तभी प्रभावी होंगी जब यह साक्ष्यों से पुष्ट हो कि पीड़ित को उसकी सामाजिक पहचान के कारण ही प्रताड़ित किया गया है। पढ़ें पूरी खबर..

नई दिल्ली: (HD News); सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने और इसके सही क्रियान्वयन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल गाली-गलौज या किसी को अपशब्द कहने मात्र से SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए यह साबित करना अनिवार्य होगा कि आरोपी का मुख्य उद्देश्य पीड़ित को उसकी 'जाति' के आधार पर अपमानित करना था।

मंशा (Intent) के बिना कानून का प्रयोग गलत

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि जाति-सूचक अपमान का स्पष्ट उल्लेख और उसका उद्देश्य न केवल एफआईआर (FIR) में बल्कि आरोप पत्र (Charge sheet) में भी होना चाहिए। यदि किसी विवाद के दौरान सामान्य रूप से गाली-गलौज की गई है और उसमें जातिगत भेदभाव का कोई ठोस आधार नहीं है, तो उसे SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल अपशब्दों का प्रयोग इस कठोर कानून को स्वतः आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

यह ऐतिहासिक फैसला पटना हाईकोर्ट के एक निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर आया है। मामले के तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद जस्टिस की बेंच ने पाया कि संबंधित एफआईआर और चार्जशीट में जाति-आधारित अपमान का कोई स्पष्ट आरोप नहीं था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां मंशा का अभाव हो, वहां निचली अदालतों द्वारा लगाए गए आरोप कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं।

धारा 3(1) की व्याख्या: सार्वजनिक दृष्टि में अपमान जरूरी

कानूनी बारीकियों को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1) का उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, इस धारा के तहत अपराध तभी गठित होता है जब:

* पीड़ित को जानबूझकर प्रताड़ित किया गया हो। * अपमान का मुख्य आधार उसकी जाति हो। * यह कृत्य सार्वजनिक स्थान पर या 'सार्वजनिक दृष्टि' (In public view) में किया गया हो। इन शर्तों के अभाव में इस अधिनियम की कठोर धाराओं का प्रयोग न्यायसंगत नहीं है।

कानून का संरक्षण बनाम दुरुपयोग: एक संतुलन

अदालत ने अपने फैसले में एक बड़ा संदेश देते हुए कहा कि SC/ST एक्ट का मूल उद्देश्य समाज के वंचित और कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि, न्यायपालिका का यह भी उत्तरदायित्व है कि वह कानून के दुरुपयोग को रोके। कोर्ट ने जांच एजेंसियों को कड़ा निर्देश दिया है कि वे ऐसे मामलों में केवल शिकायतों के आधार पर नहीं, बल्कि आरोपी के इरादे और घटना के तथ्यों की गहनता से जांच करने के बाद ही कदम उठाएं।

न्यायिक दृष्टिकोण से फैसले का महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों पर लगाम लगाने में मील का पत्थर साबित होगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कानून का लाभ केवल उन वास्तविक पीड़ितों को मिले, जिन्हें वास्तव में जातिगत विद्वेष का शिकार बनाया गया है। यह फैसला जांच अधिकारियों और निचली अदालतों के लिए भविष्य में दिशा-निर्देश के रूप में कार्य करेगा।

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