हिमाचल प्रदेश के ईको-सेंसिटिव जोन बड़ोग और कुमारहट्टी की पहाड़ियों में बाहरी राज्यों के बिल्डरों द्वारा मचाई जा रही तबाही पर प्रदेश उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। 50 हजार वर्ग मीटर में फैले 155 हरे पेड़ों का कटान, 7 प्राकृतिक नालों का रास्ता रोकना और बाहरी बिल्डरों द्वारा धारा 118 का खुला उल्लंघन... इन सब पर हाई कोर्ट ने सरकार, वन विभाग और TCP को कड़ी फटकार लगाई है। वन विभाग की कार्रवाई को अदालत ने 'लीपापोती' करार दिया है और साफ चेतावनी दी है कि अगर विभाग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, तो यह पूरा मामला सीबीआई (CBI) के हवाले किया जा सकता है। आइए विस्तार से देखते हैं अर्थ हीलर्स फाउंडेशन की याचिका पर हाई कोर्ट के इस आदेश की पूरी रिपोर्ट..."
पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में कंक्रीट का जाल
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सोलन जिले के बड़ोग और कुमारहट्टी की पर्यावरण-संवेदनशील पहाड़ियों में बाहरी राज्यों के बिल्डरों द्वारा किए जा रहे बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण, पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक नालों के अवरोध पर कड़ा संज्ञान लिया है। अर्थ हीलर्स फाउंडेशन (Earth Healers Foundation) द्वारा दायर जनहित याचिका (CWPIL No. 77 of 2026) सहित अन्य संबंधित मामलों की 15 सितंबर 2026 को संयुक्त सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधवालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने सरकार और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि विभागों ने अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभाई, तो पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई (CBI) जैसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जा सकती है।

7 प्राकृतिक नालों का प्रवाह बंद, अवैध बोरवेल से भूजल का दोहन
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष गंभीर तथ्य रखे गए कि चंडीगढ़, जीरकपुर, मोहाली, अमृतसर, नोएडा और दिल्ली जैसे बाहरी क्षेत्रों के बिल्डरों द्वारा गांव खील जशली, कोरों, पडगियानी और केंथरी की पहाड़ियों में अनियंत्रित कंक्रीट का जाल बिछाया जा रहा है। भारी निर्माण कार्य के चलते क्षेत्र के लगभग 7 प्राकृतिक नालों (waterways) के बहाव को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया गया है। इसके अलावा, इन व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए अंधाधुंध अवैध बोरवेल खोदे जा रहे हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और जलस्तर पूरी तरह संकट में पड़ गया है। अदालत ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य के संबंधित विभाग, जिनका काम इन समस्याओं का आकलन और समाधान करना है, वे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह भाग रहे हैं।
धारा 118 का खुला दुरुपयोग: बाहरी बिल्डरों को कैसे मिली जमीन?
अदालत ने गैर-हिमाचली बिल्डरों को जमीन की बिक्री और निर्माण की स्वीकृतियों पर राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया। खंडपीठ ने कड़े शब्दों में पूछा कि 'हिमाचल प्रदेश काश्तकारी और भूमि सुधार अधिनियम, 1972' की धारा 118 के तहत बाहरी राज्यों के बिल्डरों को किस उद्देश्य और आधार पर अनुमतियां दी गईं? न्यायालय ने सरकार से जानना चाहा कि क्या उनके पास कोई ऐसा वैज्ञानिक या तकनीकी डेटा मौजूद है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि बड़ोग का यह ईको-सेंसिटिव क्षेत्र इतने भारी निर्माण का भार वहन करने में सक्षम है। अदालत ने पाया कि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) और स्थानीय पंचायतों द्वारा सही मॉनिटरिंग न किए जाने का फायदा उठाकर बाहरी बिल्डर्स नियमों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर रहे हैं।

50 हजार वर्ग मीटर में 155 पेड़ काटे, वन विभाग की रिपोर्ट 'कवर-अप'
अदालत में वन विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि SSRN Infracon LLP, Barog Resorts और MMM Infra Private Limited नामक तीन बिल्डरों द्वारा लगभग 50, 058 वर्ग मीटर क्षेत्र में 155 पेड़ काटे गए हैं। बिल्डरों का बचाव करते हुए वन विभाग ने तर्क दिया कि यह कटाई निजी भूमि पर हुई है, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'एचपी लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट, 1978' के तहत निजी भूमि पर भी पेड़ काटने की एक निश्चित सीमा तय है। इतने बड़े विनाश पर वन विभाग द्वारा केवल एक व्यक्ति को 10, 800 रुपये का मामूली जुर्माना लगाने पर अदालत ने तंज कसा और इसे विभाग की ओर से की जा रही स्पष्ट 'लीपापोती' (cover-up) करार दिया।
अदालत के आदेशों की अनदेखी और बेनामी निर्माण
अदालत ने सरकार की गंभीरता पर सवाल उठाते हुए कहा कि 11 मई और 10 जुलाई को आदेश देने के बावजूद राज्य सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। केवल 25 अगस्त को तीसरे अदालती आदेश के बाद ही कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। इसके अलावा, गांव खील जशली कोरों (पडगियानी के पास) में बेनामी संपत्तियों के निर्माण की शिकायत संबंधी एसडीएम सोलन के 18 फरवरी 2026 के पत्र का भी संज्ञान लिया गया। छह महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी उचित कार्रवाई न होने पर उच्च न्यायालय ने उपायुक्त (DC) सोलन को निजी हलफनामा (affidavit) दायर कर यह स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं कि उन्होंने इस संबंध में अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं।

हाई कोर्ट के प्रमुख निर्देश
पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने कई सख्त निर्देश जारी किए हैं:
1). राज्य सरकार और निदेशक (TCP) पिछले 10 वर्षों में सोलन (विशेषकर बड़ोग), नाहन और शिमला में धारा 118 के तहत दी गई सभी अनुमतियों का विस्तृत ब्योरा कोर्ट में प्रस्तुत करें।
2). 6-6 मंजिला इमारतों का निर्माण करने वाले बाहरी 21 बिल्डरों (जिन्हें 14.09.2026 को निर्माण अनुमतियां दी गईं) को किस स्तर पर और कब अनुमतियां दी गईं, इसकी पूरी फाइल पेश की जाए।
3). पेड़ों की अवैध कटाई में शामिल तीनों बिल्डरों के खिलाफ वन विभाग अविलंब नोटिस जारी करे।
इस महत्वपूर्ण मामले की आगामी सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को तय की गई है, जहाँ अदालत यह तय करेगी कि आगे की जांच सीबीआई को सौंपी जाए या नहीं।
डिस्क्लेमर: यह समाचार माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 15 सितंबर 2026 को जनहित याचिका (CWPIL No. 13/2021 एवं CWPIL No. 77/2026) के तहत पारित आदेशों और अदालत में प्रस्तुत तथ्यों पर आधारित है। मामला अभी माननीय न्यायालय के विचाराधीन (Sub-judice) है। इस खबर का उद्देश्य जनता को कानूनी कार्यवाही और पर्यावरणीय मुद्दों से अवगत कराना है, किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना नहीं।