हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन (Family Pension) से जुड़े एक मामले में बेहद अहम और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की अपील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भले ही पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी को पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त न हो, लेकिन पहली पत्नी के निधन के बाद दूसरी पत्नी को वित्तीय संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने तकनीकी नियमों के बजाय 'सामाजिक न्याय' और 'लंबे समय तक साथ रहने' को आधार मानते हुए, सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी का नाम दर्ज कर उसे पेंशन का लाभ देने के सख्त आदेश दिए हैं। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन के मामले में एक ऐतिहासिक और बेहद मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया है कि भले ही पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी पेंशन की हकदार नहीं होती, लेकिन पहली पत्नी के निधन के बाद उसे इस वित्तीय अधिकार और संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील को सिरे से खारिज करते हुए, सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी का नाम दर्ज कर उसे फैमिली पेंशन देने के आदेश दिए हैं।

इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने तकनीकी नियमों के ऊपर सामाजिक न्याय को तरजीह दी है। खंडपीठ ने अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि भले ही हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली पत्नी के रहते की गई दूसरी शादी को पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त न हो, लेकिन 'लंबे समय तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहने' के तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि सामाजिक न्याय और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के मूल सिद्धांतों के तहत, पहली पत्नी के निधन के बाद दूसरी पत्नी को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता।
यह पूरा कानूनी विवाद याचिकाकर्ता महेश राम से जुड़ा है, जो वर्ष 2003 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पहली पत्नी कमलेश देवी से उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी निसंतानता के कारण महेश राम ने पहली पत्नी के जीवित रहते ही उनकी बहन ज्वाला देवी से दूसरी शादी कर ली थी। 20 अप्रैल 2020 को जब पहली पत्नी का निधन हो गया, तब महेश राम ने पेंशन पेमेंट ऑर्डर (पीपीओ) और अपने सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी का नाम दर्ज करने का आधिकारिक अनुरोध किया।

राज्य सरकार और संबंधित विभाग ने इस मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत यह शादी अमान्य है। सरकार के इस अड़ियल रवैये के खिलाफ महेश राम ने 2024 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 17 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट के एकल जज ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को रिकॉर्ड दुरुस्त करने का निर्देश दिया। सरकार ने इस फैसले को खंडपीठ में चुनौती दी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार की सारी दलीलों को दरकिनार कर दिया और दूसरी पत्नी के अधिकारों पर अपनी अंतिम व निर्णायक मुहर लगा दी।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला महज़ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के मानवीय दृष्टिकोण की एक सशक्त मिसाल है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि कानून का उद्देश्य लोगों को संरक्षण देना है, न कि तकनीकी या नियम-कायदों के जाल में उलझाकर उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करना। 'लंबे समय तक साथ रहने' को आधार मानकर दूसरी पत्नी को पेंशन का हकदार ठहराना, सामाजिक न्याय और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा की दिशा में एक दूरगामी कदम है।

अंततः, यह निर्णय इस बात पर मुहर लगाता है कि जब बात किसी बेसहारा के जीवनयापन और वित्तीय संरक्षण की हो, तो मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक न्याय हमेशा कठोर व तकनीकी नियमों से ऊपर होते हैं। यह फैसला भविष्य में ऐसे ही कानूनी विवादों के लिए एक मजबूत नजीर (Precedent) साबित होगा।