हिमाचल प्रदेश में बढ़ते कर्ज को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर कर्ज के मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2022 में प्रदेश पर करीब 69 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। आखिर प्रदेश पर बढ़ते कर्ज की वजह क्या है? क्या इस उधारी का लाभ विकास कार्यों में दिखाई दे रहा है? और इस मुद्दे पर सरकार का क्या पक्ष है? पढ़ें विस्तार से..
हिमाचल पर बढ़ता कर्ज… सरकार और विपक्ष आमने-सामने! क्या प्रदेश की आर्थिक स्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है?
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कर्ज का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि मौजूदा सरकार अपने एक ही कार्यकाल में इतना कर्ज ले रही है, जितना प्रदेश की पिछली कई सरकारों ने मिलकर लिया था। उन्होंने मुख्यमंत्री पर कर्ज के आंकड़ों को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप भी लगाया है।

जयराम ठाकुर ने अपने दावे के समर्थन में पिछली सरकारों के कार्यकाल के आंकड़े सामने रखे। उनके अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में कर्ज लेने की वार्षिक औसत दर लगभग 10 प्रतिशत, जबकि वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में करीब 12 प्रतिशत थी। वहीं, उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार के दौरान यह औसत दर 7.2 प्रतिशत रही थी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य पर बढ़ते कर्ज को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि वर्ष 2022 में जब कांग्रेस सरकार सत्ता में आई, उस समय हिमाचल प्रदेश पर लगभग 69 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था। उनके दावे के मुताबिक, मौजूदा सरकार के कार्यकाल में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

जयराम ठाकुर का आरोप है कि प्रदेश गठन से लेकर वर्ष 2022 तक विभिन्न सरकारों द्वारा लिए गए कुल कर्ज के लगभग बराबर का कर्ज मौजूदा सरकार अपने एक ही कार्यकाल में ले रही है। हालांकि, इन आंकड़ों की सटीक तुलना के लिए सरकारी ऋण विवरण, संबंधित अवधि और कर्ज की गणना के आधार का मिलान करना जरूरी है।
सवाल सिर्फ कर्ज लेने का नहीं, बल्कि उस कर्ज के इस्तेमाल का भी है। विपक्ष का आरोप है कि भारी उधारी के बावजूद प्रदेश में विकास कार्यों की रफ्तार अपेक्षित नहीं है। जयराम ठाकुर ने सरकार को घेरते हुए सवाल उठाया है कि यदि इतना बड़ा कर्ज लिया जा रहा है, तो उसका लाभ प्रदेश की जनता और विकास कार्यों में कितना दिखाई दे रहा है?

वहीं, इस पूरे मामले में सरकार का पक्ष और कर्ज से जुड़े आधिकारिक आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। किसी भी सरकार की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल कुल कर्ज से नहीं, बल्कि राजस्व, ब्याज भुगतान, राजकोषीय घाटे, विकास व्यय और कर्ज के उपयोग जैसे पहलुओं से भी किया जाना चाहिए।
फिलहाल, हिमाचल प्रदेश में कर्ज का मुद्दा सियासी बहस के केंद्र में है। अब बड़ा सवाल यह है कि सरकार बढ़ते कर्ज पर क्या जवाब देती है और प्रदेश की जनता को इसके बदले विकास के मोर्चे पर क्या ठोस परिणाम दिखाई देते हैं?
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस खबर में दिखाए गए सभी आंकड़े, दावे और आरोप पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के बयानों पर आधारित हैं। हमारा पेज/चैनल इन राजनीतिक दावों और वित्तीय आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह खबर केवल सूचना के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।