हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने नई दिल्ली के संसद भवन में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि जनकेंद्रित विकास का रास्ता संवाद, सहयोग और साझा जिम्मेदारी से होकर ही गुजरता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिमाचल के पंचायती राज का उदाहरण देते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं में पारदर्शिता, तकनीक के उपयोग और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं व युवाओं की प्रभावी भागीदारी को समावेशी विकास की असली आत्मा करार दिया।

नई दिल्ली: नई दिल्ली के संसद भवन में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच को संबोधित करते हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने जनकेंद्रित विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक मार्ग संवाद, सहयोग और साझा जिम्मेदारी से होकर ही गुजरता है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा उद्घाटित इस ऐतिहासिक सम्मेलन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों और 10 सहयोगी देशों के पीठासीन अधिकारियों व संसदों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन के शुभारंभ के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संविधान सदन में सभी विदेशी प्रतिनिधियों और राज्यों के पीठासीन अधिकारियों से मुलाकात की।

अपने संबोधन में पठानिया ने लोकतांत्रिक संस्थाओं में पारदर्शिता को अनिवार्य बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सार्वजनिक धन का उपयोग कहां हो रहा है और जन प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर क्या कार्रवाई की जा रही है। समावेशी विकास के लिए नीति-निर्माण में महिलाओं और युवाओं की प्रभावी भागीदारी की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं के अनुभव शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक कल्याण जैसी नीतियों को अधिक संवेदनशील और व्यापक बनाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिमाचल प्रदेश का उदाहरण पेश करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि ऊंचे पर्वतों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद राज्य ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सूचकांकों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। इसका श्रेय उन्होंने प्रदेश के परिश्रमी नागरिकों और पंचायती राज संस्थाओं की मजबूती को दिया। पठानिया ने बताया कि हिमाचल की ग्राम सभाओं में लोग स्वयं अपने गांव के विकास (सड़क, पेयजल, स्कूल) की रूपरेखा तय करते हैं। पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया है और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी ने नीतियों को अधिक परिणामोन्मुखी बनाया है।

अंत में पठानिया ने कहा कि संसद महज कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह जनता की आकांक्षाओं और अधिकारों का प्रतिनिधि मंच है। डिजिटल तकनीक के उपयोग, मजबूत संसदीय समितियों और प्रभावी निगरानी के जरिए संसदों को नागरिकों के और करीब लाया जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब नीतियां समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाएंगी और संसदें सरकार की जवाबदेही तय करेंगी, तभी लोकतंत्र अपने सच्चे अर्थों में सार्थक और समावेशी सिद्ध होगा।
