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धर्म/संस्कृति

धनतेरस 2019: जानिए क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार, क्यों खरीदते हैं इस दिन सोना ?

October 25, 2019 09:14 AM

शिमला: (हिमदर्शन न्यूज़); जानिए क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार, क्यों खरीदते हैं इस दिन सोना? धनतेरस के दिन इस शुभ मुहूर्त पर करें खरीददारी, जानिए पूजा विधि और महत्‍व -

धनतेरस 2019: धन तेरस यह पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा है। विशेषकर पीतल व चांदी के बर्तन खरीदने का रिवाज़ है। मान्यता है कि इस दिन जो कुछ भी खरीदा जाता है उसमें लाभ होता है। धन संपदा में वृद्धि होती है। इसलिये इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धन्वंतरि भी इसी दिन अवतरित हुए थे इसी कारण इसे धन तेरस कहा जाता है। देवताओं व असुरों द्वारा संयुक्त रूप से किये गये समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए चौदह रत्नों में धन्वन्तरि व माता लक्ष्मी शामिल हैं। यह तिथि धनत्रयोदशी के नाम से भी जानी जाती है|

इस दिन लक्ष्मी के साथ धन्वन्तरि की पूजा की जाती है। दीपावली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दीपोत्सव का आरंभ धनतेरस से होता है। धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

धनतेरस के दिन सोना खरीदने का क्या महत्व है ?

धनतेरस पर कई तरह की चीजें खरीदी जाती हैं, लोग इस दिन सोना, चांदी, बर्तन, कपड़े इत्यादि खरीदते हैं, क्या आप जानते हैं कि इस दिन सोना क्यों खरीदा जाता है। इसके पीछे भी एक कथा है। कहा जाता है कि हिम नाम का एक राजा था, उसके बेटे को श्राप मिला था कि शादी के चौथे दिन ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। जो राजकुमारी हिम के बेटे से प्यार करती थी उसे जब पता चला कि ऐसा है तो उसने शादी तो की लेकिन चौथे दिन पति से जागे रहने को कहा। पति को नींद ना आए इसलिए वो पूरी रात उन्हें कहानियां और गीत सुनाती रही। उसने घर के दरवाजे पर सोना-चांदी और बहुत सारे आभूषण रख दिए। खूब सारे दीए जलाए। जब यमराज सांप के रूप में हिम के बेटे की जान लेने आए तो इतनी चमक-धमक देखकर अंधे हो गए। सांप घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाया और आभूषणों के ऊपर बैठकर कहानी और गीत सुनने लगे।

ऐसे ही सुबह हो गई और राजकुमार की मृत्यु की घड़ी खत्म हो गई। यमराज को बिना प्राण लिए ही वापस जाना पड़ा। कहा जाता है कि इस दिन सोना-चांदी खरीदने से अशुभ चीजें और नकारात्मक शक्तियां घर के अंदर नहीं आ पाती है।

धनतेरस पर दक्षिण दिशा में दीप जलाने का महत्त्व

धनतेरस पर दक्षिण दिशा में दिया जलाया जाता है। इसके पिछे की कहानी कुछ यूं है। एक दिन दूत ने बातों ही बातों में यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यमदेव ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दिया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आँगन में यम देवता के नाम पर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं। फलस्वरूप उपासक और उसके परिवार को मृत्युदेव यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। विशेषरूप से यदि घर की लक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।

धनतेरस पूजा विधि

संध्याकाल में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पूजा के स्थान पर उत्तर दिशा की तरफ भगवान कुबेर और धन्वन्तरि की मूर्ति स्थापना कर उनकी पूजा करनी चाहिए। इनके साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा का विधान है। ऐसी मान्‍यता है कि भगवान कुबेर को सफेद मिठाई, जबकि धनवंतरि‍ को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए । क्योंकि धन्वन्तरि को पीली वस्तु अधिक प्रिय है। पूजा में फूल, फल, चावल, रोली, चंदन, धूप व दीप का इस्तेमाल करना फलदायक होता है। धनतेरस के अवसर पर यमदेव के नाम से एक दीपक निकालने की भी प्रथा है। दीप जलाकर श्रद्धाभाव से यमराज को नमन करना चाहिए।

धनतेरस की तिथि और शुभ मुहूर्त

धनतेरस की तिथि:  25 अक्‍टूबर 2019 

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 25 अक्‍टूबर 2019 को शाम 07 बजकर 08 मिनट से 

त्रयोदशी तिथि समाप्‍त: 26 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 03 बजकर 36 मिनट 

धनतेरस पूजा मुहूर्त: 25 अक्‍टूबर 2019 को शाम 07 बजकर 08 मिनट से रात 08 बजकर 13 मिनट तक  

अवधि: 01 घंटे 05 मिनट 

जानें, क्यों मनाया जाता है धनतेरस?

मान्यता है कि इस दिन समुद्र मंथन के दौरान, अमृत का कलश लेकर धनवंतरी प्रकट हुए थे। इस कारण इस दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा।

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, धनवंतरी के प्रकट होने के ठीक दो दिन बाद मां लक्ष्मी प्रकट हुईं थी । यही कारण है कि हर बार दिवाली से दो दिन पहले ही धनतेरस मनाया जाता है।

इस दिन स्वास्थ्य रक्षा के लिए धनवंतरी देव की उपासना की जाती है। इस दिन को कुबेर का दिन भी माना जाता है और धन संपन्नता के लिए कुबेर की पूजा की जाती है।

आपको और आपके परिवार को धनतेरस की हार्दिक शुभकासमनाएँ.. आदर सहित : ओम प्रकाश ठाकुर

धनतेरस की कुछ लधु पौराणिक कथाएं -

एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मीजी ने भी उनके साथ चलने का आग्रह किया. विष्णु जी ने कहा कि मैं आपसे जो कहूं वह आप मानेंगी तो आप मेरे साथ चल सकती हैं. लक्ष्मीजी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ धरती पर आ गईं।

कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंच कर भगवान विष्णु ने लक्ष्मीजी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो. मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना. विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतुहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है, जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए।

लक्ष्मीजी से रहा नहीं गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं. कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे. सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं. आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मीजी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।

उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मीजी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो. ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए. लक्ष्मीजी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा. किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया. पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया. लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया।

किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं। विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया. तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं. इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके. इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं. तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है।

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, राजा बलि के भय से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था, जिसके बाद वह यग स्थल पर जा पहुंचे थे।

लेकिन असुरों के गुरु शुक्राचार्य पहचान गए थे कि वामन के रूप में भगवान विष्णु ही हैं. इसलिए उन्होंने राजा बलि से कहा कि वामन जो भी मांगे वो उन्हें ना दिया जाए. साथ ही उन्होंने कहा कि वामन के रूप में भगवान विष्णु हैं, जो देवताओं की सहायता करने के लिए यहां आए  हैं।

लेकिन राजा बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं सुनी और वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि दान करने के लिए तैयार हो गए. लेकिन शुक्राचार्य ऐसा नहीं चाहते थे, इसलिए राजा बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य ने उनके कमंडल में लघु रूप धारण करके  प्रवेश कर लिया था।

लेकिन भगवान वामन भी शुक्राचार्य के छल को समझ गए थे, जिसके बाद उन्होंने अपने हाथों में मौजूद कुशा को कमंडल में इस तरह रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई।

कहा जाता है कि इसके बाद भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि को बलि ने दान करने का निर्णय ले लिया। उस समय भगवान वामन ने अपने एक पैर से पूरी धरती को नापा और दूसरे पैर से अंतरिक्ष को नाप लिया. लेकिन तीसरा पैर रखने के लिए कुछ स्थान नहीं बचा था, जिसके बाद बलि ने वामन भगवान के चरणों में अपना सिर रख दिया था. देवताओं को बलि के भय से इस तरह मुक्ति मिल गई थी. इसी जीत की खुशी में धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

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