हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी (IGMC) में रेजिडेंट डॉक्टरों की हड़ताल अब एक अभूतपूर्व प्रशासनिक और आंतरिक संकट में बदल गई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा डॉक्टरों को 'अहंकार त्यागने' और सोमवार से काम पर लौटने के कड़े अल्टीमेटम के बाद रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट गई है। जहाँ संगठन का एक गुट मुख्यमंत्री के जांच के आश्वासन पर भरोसा जताते हुए ड्यूटी पर लौट आया है, वहीं दूसरा गुट अभी भी अस्पताल के मुख्य गेट पर धरने पर अड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री की इस सख्ती और डॉक्टरों के बीच उपजी इस 'दोफाड़' ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को एक गहरे असमंजस में डाल दिया है। देखें पूरी खबर..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी (IGMC) में जारी डॉक्टरों की हड़ताल अब एक नाटकीय और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर पहुँच गई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के कड़े तेवर और रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) के भीतर पैदा हुई आंतरिक फूट ने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को एक बड़े असमंजस में डाल दिया है। जहाँ मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों को 'अहंकार' छोड़ने की नसीहत दी है, वहीं संगठन के दो गुटों में बंट जाने से मरीजों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने रेजिडेंट डॉक्टरों को अपना अहंकार त्याग कर सोमवार से तत्काल ड्यूटी पर लौटने का कड़ा निर्देश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह हड़ताल एक गलत बात का समर्थन करने के लिए की जा रही है, जो किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं जांच का भरोसा दिलाया था, इसके बावजूद हड़ताल पर जाना प्रशासनिक विश्वास की अवहेलना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार प्रदेश की 75 लाख जनता के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और स्वास्थ्य सेवाओं में किसी भी तरह का व्यवधान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुख्यमंत्री के इस कड़े संदेश और अल्टीमेटम के बाद IGMC RDA स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट गया है। संगठन के भीतर उपजे मतभेदों के बीच एक गुट ने मुख्यमंत्री द्वारा डॉ. राघव नरुला मामले में दिए गए जांच के आश्वासन पर भरोसा जताते हुए हड़ताल तत्काल प्रभाव से वापस लेने का निर्णय लिया है। इस गुट के डॉक्टर काम पर लौट आए हैं। इसके विपरीत, दूसरा गुट अभी भी अपनी मांगों को लेकर अस्पताल के मुख्य गेट पर डटा हुआ है और प्रदर्शन करते हुए हड़ताल जारी रखने की जिद पर अड़ा है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव पर गहरी चिंता जताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल की जनता डॉक्टर को भगवान का रूप मानती है। अगर डॉक्टरों का व्यवहार और रवैया इसी तरह नकारात्मक रहा, तो आम जनमानस का सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा। उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा कि डॉक्टर अगर केवल प्यार से बात करें तो मरीज की आधी बीमारी वैसे ही ठीक हो जाती है, इसलिए उन्हें अपने 'अहम' को त्यागकर सेवाभाव को सर्वोपरि रखना चाहिए।

फिलहाल, इस आंतरिक कलह और दोफाड़ के बीच स्वास्थ्य व्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हड़ताल खत्म करने वाले गुट ने कहा है कि वे आगामी 3 जनवरी 2026 को होने वाली बैठक में भविष्य की रणनीति तय करेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि रेजिडेंट डॉक्टरों के इस आपसी मतभेद और दो धड़ों में बंटी जिद के बीच, पिसती हुई बेगुनाह जनता को इस संकट से पूरी तरह कब निजात मिलेगी।
आईजीएमसी शिमला में उपजा यह संकट अब केवल एक हड़ताल नहीं, बल्कि डॉक्टरों के आपसी मतभेदों और सरकार की प्रशासनिक सख्ती के बीच का एक जटिल संघर्ष बन गया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के कड़े तेवर ने जहाँ संगठन के एक हिस्से को 'कर्तव्य पथ' पर लौटने के लिए प्रेरित किया, वहीं दूसरे गुट की अड़ियल रणनीति ने पूर्ण समाधान की राह में नए रोड़े अटका दिए हैं। विडंबना यह है कि 'देवभूमि के उपचारकों' के बीच की इस आंतरिक फूट और दो धड़ों में बंटी जिद का सीधा खामियाजा उन बेगुनाह मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके लिए अस्पताल ही अंतिम उम्मीद है। अब सभी की निगाहें सरकार की आगामी जांच प्रक्रिया और 3 जनवरी 2026 को होने वाली आरडीए की अगली बैठक पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि हिमाचल की स्वास्थ्य व्यवस्था में यह गतिरोध पूर्णतः समाप्त होगा या विवाद का एक नया अध्याय शुरू होगा।"