शिमला नगर निगम के बजट सत्र में उस वक्त भारी संवैधानिक और राजनीतिक घमासान छिड़ गया, जब मेयर सुरेंद्र चौहान ने बजट पेश किया। भाजपा पार्षदों ने मेयर की शक्तियों को 'शून्य' करार देते हुए उनके द्वारा बजट पेश करने की वैधता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा का सीधा आरोप है कि जब मेयर के पास पद पर बने रहने की संवैधानिक शक्ति ही नहीं है, तो वह बजट जैसा महत्वपूर्ण दस्तावेज सदन में कैसे रख सकते हैं ? पढ़ें पूरी खबर..
शिमला: (HD News); शिमला नगर निगम में मेयर सुरेंद्र चौहान द्वारा पेश किए गए बजट ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। बीजेपी पार्षदों ने मेयर के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उनकी कार्यप्रणाली और बजट पेश करने की वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि मेयर के पास वर्तमान में कोई संवैधानिक पद नहीं है, ऐसे में उनके द्वारा बजट पेश करना पूरी तरह से असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है।

संवैधानिक संकट की आहट, मेयर के अधिकार क्षेत्र पर सवाल:
बीजेपी पार्षदों का नेतृत्व कर रही सरोज ठाकुर ने मीडिया से बातचीत में मेयर की स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा किया। उन्होंने तर्क दिया कि मेयर पद से संबंधित अध्यादेश 6 जनवरी को ही समाप्त हो चुका है। इस अध्यादेश के समाप्त होने के साथ ही मेयर के पास सदन की अध्यक्षता करने और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की कोई संवैधानिक शक्ति नहीं बची है। ऐसे में, एक 'पदहीन' व्यक्ति द्वारा नगर निगम का बजट पेश करना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं का भी हनन है।
बजट की वैधता पर प्रश्नचिह्न, कानूनी लड़ाई के संकेत:
बीजेपी पार्षदों ने मेयर के इस कदम को पूरी तरह से अवैध करार दिया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जब मेयर के पास कोई संवैधानिक अधिकार ही नहीं है, तो वे बजट जैसा महत्वपूर्ण दस्तावेज कैसे पेश कर सकते हैं? इस मामले को लेकर पार्षदों ने पहले ही न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि यह विवाद जल्द ही कानूनी लड़ाई का रूप ले सकता है।

नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग, डीसी से हस्तक्षेप की गुहार:
पार्षदों ने मेयर से नैतिकता के आधार पर तत्काल इस्तीफा देने की मांग की है। उनका मानना है कि एक 'पदहीन' मेयर का अपने पद पर बने रहना नगर निगम की गरिमा को धूमिल कर रहा है। उन्होंने जिला उपायुक्त (DC) को ज्ञापन सौंपकर इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करने और उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया है।
आगे की राह:
शिमला नगर निगम में मेयर के पद और बजट को लेकर छिड़ा यह विवाद अब एक राजनीतिक और कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि न्यायालय इस मामले में क्या फैसला सुनाता है और इसका शिमला नगर निगम की कार्यप्रणाली पर क्या असर पड़ता है।

भाजपा पार्षदों ने मेयर सुरेंद्र चौहान से नैतिकता के आधार पर तत्काल इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि संवैधानिक संकट खड़ा करके जबरन पद पर बने रहना गलत है। बहरहाल, डीसी को ज्ञापन सौंपने और मामला कोर्ट में होने के कारण, शिमला नगर निगम का यह बजट सत्र अब प्रशासनिक और कानूनी पेचीदगियों में बुरी तरह उलझ गया है, जिसका सीधा असर शहर के विकास कार्यों पर पड़ सकता है।