हिमाचल प्रदेश की सियासत में एक बार फिर ‘अपनों का डर’ सबसे बड़ा संकट बनकर उभर रहा है। 16 मार्च का राज्यसभा चुनाव बहुमत की ताकत से ज्यादा राजनीतिक भरोसे और पार्टी एकजुटता की परीक्षा बन गया है। 2024 की क्रॉस वोटिंग से सत्ता की नींव तक हिलाने वाला झटका झेल चुकी कांग्रेस इस बार पूरी तरह सतर्क है, लेकिन गुटबाजी की चिंगारी और भाजपा की रणनीतिक चुप्पी माहौल को बेहद विस्फोटक बना रही है। संख्या कांग्रेस के पक्ष में जरूर है, मगर हिमाचल की राजनीति में गणित से ज्यादा केमिस्ट्री कब भारी पड़ जाए - यही सबसे बड़ा सस्पेंस है। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने एक बार फिर सियासी पारे को उबाल पर ला दिया है। आंकड़ों के गणित में 40 विधायकों के पूर्ण बहुमत के साथ सत्तासीन कांग्रेस का पलड़ा भले ही भारी नजर आ रहा हो, लेकिन पार्टी के भीतर 'क्रॉस वोटिंग' की दहशत साफ महसूस की जा सकती है। 2024 में अपनों की ही बगावत का गहरा जख्म झेल चुकी सुक्खू सरकार और कांग्रेस हाईकमान इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। वहीं, 28 विधायकों वाली विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) खामोशी से कांग्रेस की अंतर्कलह पर नजर गड़ाए हुए है और सही वक्त पर 'सियासी स्ट्राइक' करने की फिराक में है।

2024 का वो 'सियासी जख्म' जो अब भी हरा है
कांग्रेस की इस मौजूदा घबराहट के पीछे साल 2024 के राज्यसभा चुनाव का वह कड़वा सच है, जिसने पूरी सरकार की नींव हिला दी थी। उस वक्त भी कांग्रेस के पास बहुमत का जादुई आंकड़ा था, लेकिन पार्टी के दिग्गज राष्ट्रीय उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को हार का मुंह देखना पड़ा था। कांग्रेस के छह बागी विधायकों और सरकार को समर्थन दे रहे तीन निर्दलीयों ने रातों-रात पाला बदलकर कांग्रेस के ही पूर्व नेता और भाजपा प्रत्याशी हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी। नतीजा यह रहा कि दोनों प्रत्याशियों को 34-34 वोट मिले और पर्ची सिस्टम (लॉटरी) से बाजी हर्ष महाजन के हाथ लगी। इस एक हार ने प्रदेश में ऐसा राजनीतिक भूचाल ला दिया था कि लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया था, जिन्हें बाद में हाईकमान ने बड़ी मुश्किल से मनाया था।
चरम पर गुटबाजी, डैमेज कंट्रोल में जुटा हाईकमान
वर्तमान परिस्थितियों की बात करें तो कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा खुद के घर में मची कलह है। पार्टी में गुटबाजी अपने चरम पर है, जिसे देखते हुए दिल्ली में बैठे राष्ट्रीय नेतृत्व ने सीधे दखल देना शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी हाईकमान किसी भी हाल में पिछली गलतियों को दोहराने के मूड में नहीं है। चुनाव से ठीक पहले पर्यवेक्षकों और राष्ट्रीय पदाधिकारियों की शिमला में तैनाती की जाएगी, ताकि विधायकों की नब्ज टटोली जा सके और एक ऐसे सर्वमान्य प्रत्याशी पर मुहर लगाई जाए जिससे किसी भी तरह की बगावत या क्रॉस वोटिंग की गुंजाइश को शून्य किया जा सके।

घात लगाए बैठी है भाजपा, उम्मीदवार की घोषणा का इंतजार
दूसरी ओर, विधानसभा में 28 सदस्यों वाली भाजपा फिलहाल पूरी तरह से 'वेट एंड वॉच' की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस किसे अपना उम्मीदवार बनाती है। कांग्रेस के पत्ते खुलने के बाद ही भाजपा अपनी अगली चाल चलेगी। चूँकि अगले ही वर्ष प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी प्रस्तावित हैं, ऐसे में भाजपा सीधे तौर पर कोई बड़ा उलटफेर करेगी, इसकी उम्मीद कम है, लेकिन वह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने सधे हुए अंदाज में स्पष्ट किया है कि राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारने को लेकर पार्टी हाईकमान से विस्तृत चर्चा के बाद ही निर्णय लिया जाएगा। पार्टी पूरी गंभीरता से इस मसले पर विचार कर अपनी अचूक रणनीति तैयार करेगी।
"बीजेपी के पास कोई जादुई छड़ी नहीं", मंत्री जगत सिंह नेगी का तीखा प्रहार
राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा द्वारा बनाए जा रहे इस दबाव के बीच सुक्खू सरकार के राजस्व एवं कैबिनेट मंत्री जगत सिंह नेगी ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। उन्होंने राजनीतिक विरोधियों पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने का सीधा आरोप लगाया है। नेगी ने कड़े शब्दों में कहा कि 16 मार्च के चुनाव के लिए कांग्रेस के पास विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल मौजूद है, जबकि भाजपा के पास आंकड़ों का भारी टोटा है।
पिछली क्रॉस वोटिंग की घटना को लोकतंत्र पर दाग बताते हुए नेगी ने कहा कि चुनाव हमेशा नियमों के दायरे में लड़े जाते हैं, लेकिन भाजपा की सोच और उसकी कार्यशैली लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा बन चुकी है। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा कि भाजपा केवल धनबल और खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) की गंदी राजनीति पर विश्वास रखती है, लेकिन इस बार उनका यह मंसूबा कामयाब नहीं होगा। नेगी ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा के पास ऐसी कोई जादुई छड़ी नहीं है जिसके दम पर वह अपनी जीत के मुंगेरीलाल के हसीन सपने देख रही है।

आगे क्या?
अब सभी की निगाहें आने वाले चंद दिनों पर टिकी हैं। क्या कांग्रेस आलाकमान अपने कुनबे को एकजुट रखकर 2024 के झटके से उबर पाएगा, या फिर भाजपा एक बार फिर कोई ऐसा 'सियासी चक्रव्यूह' रचेगी जिसमें कांग्रेस उलझ कर रह जाएगी? 16 मार्च का दिन हिमाचल की राजनीति के लिए एक बड़ा 'लिटमस टेस्ट' साबित होने वाला है।
अंततः, 16 मार्च का यह राज्यसभा चुनाव महज एक सीट की जंग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व और कांग्रेस हाईकमान के 'डैमेज कंट्रोल' की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। मंत्री जगत सिंह नेगी भले ही भाजपा के पास 'जादुई छड़ी' न होने का दावा कर रहे हों, लेकिन सियासत में आंकड़े कब किसके पक्ष में पलट जाएं, यह कोई नहीं जानता। अगर कांग्रेस अपने कुनबे को एकजुट रखने में थोड़ी भी विफल रही, तो यह केवल एक चुनाव की हार नहीं, बल्कि राज्य सरकार की स्थिरता पर सीधा प्रहार होगा। दूसरी ओर, भाजपा के पास इस चुनाव में खोने को कुछ नहीं है, लेकिन सेंधमारी के लिए पूरा मैदान खुला है। अब देखना दिलचस्प होगा कि गुटबाजी, धनबल और सियासी दांव-पेच की इस बिसात पर अंतिम 'शह और मात' किसकी होती है।