विदेश की चकाचौंध में अपने बूढ़े मां-बाप को 'लावारिस' छोड़ने वाली संतानों की अब खैर नहीं। राज्यसभा में आज एक ऐसा मुद्दा गूंजा जिसने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया। भाजपा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने सदन में सरकार से दो टूक मांग की है कि जो बच्चे विदेश जाकर अपने माता-पिता की सुध नहीं लेते, उनका पासपोर्ट तत्काल प्रभाव से रद्द कर उन्हें वापस भारत बुलाना चाहिए। उन्होंने पिछले साल हुए 500 ऐसे बुजुर्गों की मौत का खौफनाक मंजर बयां किया, जिनकी लाशें भारत में बंद कमरों में सड़ती रहीं और विदेश में बैठे उनके 'सफल' बच्चे अंतिम संस्कार तक के लिए नहीं आए। सांसद ने पुराने कानून को 'दंतहीन' बताते हुए अब 'अनिवार्य हलफनामे' की वकालत की है। पढ़ें विस्तार से..
नई दिल्ली : (HD News); क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो बुजुर्ग मां-बाप की जीवन भर की कमाई और जमीन-जायदाद बिकवाकर विदेश में बस गए हैं और अब पीछे मुड़कर नहीं देखते? अगर हां, तो सावधान हो जाएं। संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में अब ऐसे 'कपूतों' के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठी है।
बीजेपी के राज्यसभा सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने सरकार से मांग की है कि विदेश में रहकर अपने मां-बाप को बेसहारा छोड़ने वाले भारतीयों का पासपोर्ट तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और उन्हें डिपोर्ट कर भारत वापस लाया जाए।

"500 बुजुर्गों का अंत बेहद दर्दनाक हुआ"
सदन में एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा उठाते हुए डॉ. अग्रवाल ने दिल्ली और इंदौर की हालिया घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पिछले एक साल में 500 से अधिक ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां भारत में अकेले रह रहे बुजुर्ग माता-पिता की मौत हो गई, उनके शव सड़ते रहे, लेकिन विदेश में बैठी उनकी संतान अंतिम संस्कार तक के लिए वापस नहीं आई। सांसद ने कहा कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय क्रूरता है।
"आया का खर्च बचाने के लिए ले जाते हैं मां-बाप को"
डॉ. अग्रवाल ने प्रवासी भारतीयों (NRIs) की मानसिकता पर करारा प्रहार करते हुए कहा, "विदेश जाते ही बच्चे शुरू में मां-बाप की चिंता का नाटक करते हैं। जब वहां उनके बच्चे (पोता-पोती) होते हैं, तो वे मां-बाप को सिर्फ इसलिए बुलाते हैं क्योंकि विदेश में 'नैनी' या 'केयरटेकर' का खर्च बहुत ज्यादा है। मतलब पूरा होते ही और समय बीतने के साथ, बुजुर्गों को बोझ मानकर वापस भारत में अकेले मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।"

पुराना कानून 'दंतहीन', अब चाहिए सख्त एक्शन
सांसद ने स्पष्ट कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007' एक "दंतहीन कानून" (Toothless Law) साबित हुआ है। इसमें बुजुर्गों को न्याय के लिए अदालत जाना पड़ता है, जो भारतीय संस्कृति में मां-बाप अपने बच्चों के खिलाफ अक्सर नहीं करते। इसलिए अब जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी।
सांसद का 'प्रस्तावित रोडमैप': विदेश जाने से पहले शर्तें
डॉ. अग्रवाल ने विदेश मंत्री से अपील की कि विदेश जाने वाले हर भारतीय से एक सख्त 'हलफनामा' (Affidavit) लिया जाए, जिसमें ये शर्तें शामिल हों:
1. आय का हिस्सा: विदेश में कमाने वाली संतान को अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से भारत में रह रहे माता-पिता को भेजना होगा।
2. वीकली कॉल: हफ्ते में कम से कम एक बार माता-पिता से फोन पर बात करना अनिवार्य हो।
3. केयरटेकर और बीमा: बुजुर्गों की देखरेख के लिए केयरटेकर और उनके स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था करनी होगी।
4. NOC अनिवार्य: पासपोर्ट रिन्यूअल के समय माता-पिता से 'सर्टिफिकेट' लेना अनिवार्य हो कि उनकी संतान उनका ख्याल रख रही है। यदि मां-बाप यह सर्टिफिकेट देने से मना कर दें, तो पासपोर्ट रद्द कर दिया जाए।
देश के करीब 3.5 करोड़ लोग विदेश में रहते हैं। उनकी सफलता के पीछे उनके माता-पिता का त्याग, तपस्या और कभी-कभी बेची गई जमीनें होती हैं। ऐसे में अगर संतान इस कर्ज को भूल जाए, तो क्या कानून को लाठी नहीं उठानी चाहिए? बीजेपी सांसद की यह मांग अब एक राष्ट्रीय बहस बन गई है।
राज्यसभा में उठी यह मांग महज एक सियासी बयान नहीं, बल्कि उस सामाजिक त्रासदी का आईना है, जहां 'डॉलर' और 'पाउंड' के मोह में खून के रिश्तों की अहमियत खो गई है। डॉ. अग्रवाल का यह प्रस्ताव—कि 'सप्ताह में एक कॉल' और 'आर्थिक मदद' न करने पर पासपोर्ट रद्द हो—उन हजारों बुजुर्गों के लिए उम्मीद की किरण है जो अपने ही घरों में 'लावारिस' जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं। बहरहाल, यह मांग समाज को यह सोचने पर भी विवश करती है कि क्या आज के दौर में संतानों को उनका 'फर्ज' याद दिलाने के लिए भी अब 'कानून' का डंडा ही एकमात्र रास्ता बचा है? अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर क्या कड़ा फैसला लेती है।