हिमाचल प्रदेश की न्यायपालिका ने प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे की अनदेखी और प्रशासनिक सुस्ती पर अपना "तीसरा नेत्र" खोल लिया है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना की दुर्दशा और वहां तक पहुँचने वाली बदहाल सड़कों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य और लोक निर्माण विभाग के सचिवों को व्यक्तिगत पेशी का अल्टीमेटम दे दिया है। कोर्ट की यह तल्खी यहीं नहीं रुकी; नगर निगम मेयर के कार्यकाल से जुड़े मामले में जवाब दाखिल करने में बरती गई लापरवाही पर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया गया है। यह खबर उन सोए हुए अधिकारियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है, जिनकी फाइलों में तो विकास है, लेकिन धरातल पर जनता सुविधाओं के लिए तरस रही है। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राजधानी शिमला के बहुचर्चित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना में बुनियादी सुविधाओं के अभाव और प्रशासनिक सुस्ती पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को स्पष्ट शब्दों में फटकार लगाई। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक अस्पताल की सड़क और अन्य सुविधाओं के काम में धरातल पर ठोस प्रगति नहीं दिखी, तो प्रदेश के स्वास्थ्य और लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिवों को स्वयं अदालत में हाजिर होकर अपनी जवाबदेही तय करनी होगी।

अदालत के संज्ञान में यह गंभीर तथ्य लाया गया कि करोड़ों की लागत से बने इस अस्पताल तक पहुँचने की राह आज भी काँटों भरी है। शिमला के प्रमुख प्रवेश द्वारों - तारादेवी, कुफरी और नालदेहरा में कहीं भी अस्पताल की दिशा बताने वाले साइन बोर्ड या होर्डिंग्स नहीं लगे हैं, जिससे दूर-दराज से आने वाले मरीज और उनके तीमारदार भटकने को मजबूर हैं। यहाँ तक कि भट्ठाकुफर से चमियाना तक की मात्र 2.4 किमी सड़क का 900 मीटर हिस्सा आज भी सिंगल लेन है। कोर्ट ने हैरानी जताते हुए पीडब्ल्यूडी और वन विभाग को निर्देश दिए कि अगली सुनवाई तक इस सड़क को चौड़ा करने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति और फंड जारी करने की प्रक्रिया हर हाल में पूरी हो जानी चाहिए।

अस्पताल में पार्किंग की विकराल समस्या को लेकर भी हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जहाँ भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कम से कम 1, 000 वाहनों की पार्किंग की आवश्यकता है, वहाँ वर्तमान में मात्र 60 वाहनों की व्यवस्था ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। इस कुप्रबंधन पर पीडब्ल्यूडी सचिव से हलफनामा मांगा गया है कि वे इस समस्या का स्थायी समाधान कैसे करेंगे। इसके अलावा, मरीजों की सुगम आवाजाही के लिए आईएसबीटी और आईजीएमसी से सीधी बस सेवा शुरू करने के संबंध में HRTC के प्रबंध निदेशक से भी जवाब तलब किया गया है।
अदालत ने स्वास्थ्य विभाग को अस्पताल के भीतर चिकित्सा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए भी समयसीमा बांधी है। अस्पताल में पूर्ण रूप से संचालित ब्लड बैंक के निर्माण कार्य को 30 जून 2026 तक पूरा करने और इसके लाइसेंस की प्रक्रिया को तुरंत तेज करने के आदेश दिए गए हैं। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को तय की गई है।

प्रशासनिक लापरवाही का एक और बड़ा नमूना तब देखने को मिला जब नगर निगम मेयर के कार्यकाल को बढ़ाने संबंधी याचिका पर जवाब देने में देरी करने पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का सशर्त जुर्माना लगा दिया। कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद सरकार द्वारा दाखिल जवाब अभी भी रजिस्ट्री की आपत्तियों के घेरे में है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि यदि दो दिन के भीतर इन तकनीकी खामियों को दूर नहीं किया गया, तो सरकार को यह जुर्माना राशि जमा करानी होगी। इस मामले की अगली सुनवाई अब 24 फरवरी को होगी।