जब संकट की घड़ी में रास्ते नजर नहीं आते, तब सेवा भारती के कार्यकर्ता हाथ थामने के लिए तैयार खड़े मिलते हैं। आईजीएमसी शिमला में दुर्घटनाग्रस्त लोगों और गंभीर रूप से घायल बच्चों की सहायता कर सेवा भारती न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बना रही है, बल्कि समाज में निस्वार्थ सेवा की एक नई अलख जगा रही है। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान, इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) की व्यस्त दीर्घाओं में जहाँ हर ओर भागम-भाग और पीड़ा का माहौल होता है, वहाँ 'सेवा भारती' के कार्यकर्ता एक शांत क्रांति लिख रहे हैं। "नर सेवा ही नारायण सेवा" के मंत्र को धरातल पर उतारते हुए सेवा भारती का आईजीएमसी प्रकल्प केंद्र उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन गया है, जो अस्पताल की जटिल प्रक्रियाओं और आपाधापी में खुद को असहाय महसूस करते हैं।
जब तीन साल की मासूम के लिए 'देवदूत' बने कार्यकर्ता
हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया। एक तीन वर्षीय मासूम बच्ची, जो दो मंजिला भवन से गिरने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गई थी, उसे लहूलुहान अवस्था में एमरजेंसी लाया गया। परिजनों की आँखों में आँसू और मन में गहरा डर था; उन्हें यह तक नहीं पता था कि अस्पताल में इलाज की शुरुआत कहाँ से करें।

ऐसी विकट स्थिति में सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने बिना समय गंवाए कमान संभाली। कार्यकर्ताओं ने न केवल तुरंत बच्ची की पर्ची बनवाई, बल्कि डॉक्टरों से समन्वय कर उसे तत्काल सर्जरी और ऑर्थो एमरजेंसी में रेफर करवाया। सीटी स्कैन, एक्स-रे और ईसीजी जैसी महत्वपूर्ण जाँचों के लिए कार्यकर्ताओं ने खुद दौड़-धूप की, ताकि इलाज में एक मिनट की भी देरी न हो। उनकी इस सक्रियता ने एक मासूम की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
अकेलेपन और पीड़ा में संबल: दुर्घटना पीड़ितों की दास्तां
सेवा भारती की संवेदनशीलता का एक और उदाहरण तब देखने को मिला जब स्कूटी दुर्घटना में घायल दो युवकों को एमरजेंसी लाया गया। वे युवक शहर में अकेले थे और असहनीय दर्द से कराह रहे थे। अस्पताल की औपचारिकताओं को पूरा करने की स्थिति में वे नहीं थे। सेवा भारती के स्वयंसेवकों ने न केवल उन्हें स्ट्रेचर मुहैया कराया, बल्कि मेडिकल ऑफिसर (M.O.) को दिखाने से लेकर प्लास्टर रूम तक उनके साथ साये की तरह रहे। बिलिंग की प्रक्रिया हो या दवाइयों का इंतजाम, कार्यकर्ताओं ने तब तक साथ नहीं छोड़ा जब तक उन्हें सुरक्षित उनके वाहन तक नहीं पहुँचा दिया गया।

दुर्गम क्षेत्रों के मरीजों के लिए एक विश्वसनीय 'ब्रिज'
हिमाचल के दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए आईजीएमसी किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। अनभिज्ञता और संसाधनों की कमी के कारण कई बार मरीज सही समय पर इलाज नहीं पा पाते। यहाँ सेवा भारती के कार्यकर्ता एक 'सेतु' (Bridge) का कार्य कर रहे हैं।
"सेवा भारती का उद्देश्य केवल सहायता करना नहीं, बल्कि अस्पताल आए हर पीड़ित को यह अहसास कराना है कि वह इस संकट की घड़ी में अकेला नहीं है। करुणा और निस्वार्थ समर्पण ही हमारी शक्ति है।"
सेवा भारती शिमला का आईजीएमसी प्रकल्प केंद्र आज मानवता, करुणा और समर्पण का एक जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहाँ कार्यकर्ता किसी पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के लिए दिन-रात डटे हुए हैं। यह केंद्र सचमुच उन लोगों के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है जिनके लिए शहर और अस्पताल बिल्कुल अनजाने हैं।
समाज के इस निस्वार्थ प्रयास को आज हर ओर सराहा जा रहा है, और यह संस्था प्रदेश में सामाजिक सेवा के नए मानक स्थापित कर रही है।

कुल मिलाकर, सेवा भारती शिमला के स्वयंसेवकों द्वारा किया जा रहा यह मानवीय कार्य समाज के हर वर्ग के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। दुर्घटना पीड़ितों से लेकर मासूम बच्चों तक, हर किसी के लिए 'देवदूत' बनकर खड़े ये कार्यकर्ता यह संदेश दे रहे हैं कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। आशा है कि सेवा भारती का यह सेवा रथ निरंतर इसी ऊर्जा के साथ मानवता के कल्याण हेतु अग्रसर रहेगा।