क्या हिमाचल प्रदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करना अब डॉक्टरों के लिए सजा बन गया है? स्वास्थ्य विभाग के एक ताजा फैसले ने न केवल चिकित्सा जगत को शर्मसार किया है, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की विसंगतियों को भी चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। शिमला के चमियाना सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एक न्यूरो सर्जन (MCh) को महज 33, 600 रुपये के मानदेय पर 'जॉब ट्रेनी' रखने का प्रस्ताव दिया गया है। विडंबना देखिए कि इसी डॉक्टर को पढ़ाई के दौरान सीनियर रेजिडेंट के तौर पर सरकार 1.30 लाख रुपये का मासिक स्टाइपेंड दे रही थी। साढ़े 11 साल की कठोर तपस्या और सुपर-स्पेशलाइजेशन के बाद एक विशेषज्ञ की कीमत सीधे एक लाख रुपये घटा देना, डॉक्टर की योग्यता और स्वास्थ्य सेवाओं की गरिमा का सरेआम उपहास है। इस 'अजीबोगरीब' ऑफर के बाद अब प्रदेश के चिकित्सा गलियारों में एक ही सवाल गूँज रहा है - क्या हिमाचल में अब प्रतिभाओं की कद्र खत्म हो चुकी है ? पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD NEWS); हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐसा चौंकाने वाला फैसला लिया है, जिसने प्रदेश के चिकित्सा जगत में हलचल मचा दी है। विभाग ने सुपर स्पेशलिटी अस्पताल चमियाना के न्यूरो सर्जरी विभाग के लिए एक उच्च शिक्षित चिकित्सक को 'जॉब ट्रेनी' के तौर पर नियुक्ति का प्रस्ताव दिया है। इस प्रस्ताव में चिकित्सक को महज 33, 600 रुपये मासिक मानदेय देने की बात कही गई है, जिसे लेकर प्रदेश भर के डॉक्टरों में भारी रोष व्याप्त है।

पढ़ाई पूरी होते ही कम हो गई एक लाख सैलरी
हैरानी की बात यह है कि जिस चिकित्सक को यह ऑफर मिला है, वह आईजीएमसी (IGMC) शिमला से एमसीएच (MCh) की सुपर स्पेशलिटी डिग्री कर चुके हैं। पढ़ाई के दौरान सीनियर रेजिडेंट के रूप में सरकार उन्हें 1.30 लाख रुपये मासिक स्टाइपेंड दे रही थी। अब डिग्री पूरी होने और विशेषज्ञ बनने के बाद, उनका वेतन बढ़ने के बजाय सीधे एक लाख रुपये कम कर दिया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि यह न केवल पद का अपमान है, बल्कि साढ़े 11 साल की कड़ी मेहनत और पढ़ाई का भी मजाक है।
बेरोजगार डॉक्टरों के साथ भद्दा मजाक
प्रदेश के युवा डॉक्टरों ने सरकार के इस फैसले को शिक्षित बेरोजगारों के साथ एक क्रूर मजाक करार दिया है। डॉक्टरों का तर्क है कि न्यूरो सर्जन जैसे संवेदनशील और जटिल पद के लिए नाममात्र मानदेय पर 'जॉब ट्रेनी' का ऑफर देना स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीरता को कम करता है। वर्तमान में न्यूरो सर्जरी विभाग में पहले से ही स्टाफ की भारी कमी है; यहाँ छह सीनियर रेजिडेंट और तीन कंसलटेंट के पद रिक्त चल रहे हैं और पूरा विभाग मात्र तीन डॉक्टरों के भरोसे टिका है।

फैकल्टी एसोसिएशन ने जताई कड़ी आपत्ति
चमियाना फैकल्टी एसोसिएशन ने इस जॉब ऑफर को सिरे से खारिज करते हुए इसे अधिसूचना का उपहास बताया है। एसोसिएशन के महासचिव डॉ. यशवंत वर्मा ने कहा कि एक सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर, जिसने एम.सी.एच. जैसी उच्चतम डिग्री हासिल की हो, उसे 33, 600 रुपये के मानदेय पर रखना तर्कसंगत नहीं है। संघ ने यह भी मांग उठाई है कि मानदेय कम से कम पूर्व में मिल रहे स्टाइपेंड के बराबर होना चाहिए। इस मामले को लेकर एसोसिएशन जल्द ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से मुलाकात करेगी।
स्वास्थ्य विभाग की सफाई और भविष्य की रणनीति
इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वास्थ्य निदेशक डॉ. गोपाल बेरी ने कहा है कि विभाग इस मामले की समीक्षा करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जॉब ट्रेनी के रूप में तैनाती के दौरान डॉक्टरों को इंसेंटिव देने का भी प्रावधान है।
हालांकि, डॉक्टर इस बात से संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने इमरजेंसी विभाग के अधीन सुपर स्पेशलिटी अफसरों को रखे जाने के आदेशों पर भी आपत्ति जताई है। डॉक्टरों की मांग है कि उन्हें उनके संबंधित विभागों के अधीन ही तैनात किया जाए ताकि विशेषज्ञ सेवाओं की गुणवत्ता बनी रहे।

अंततः, स्वास्थ्य विभाग का यह कदम न केवल एक डॉक्टर के करियर के साथ खिलवाड़ है, बल्कि राज्य की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी एक आत्मघाती फैसला साबित हो सकता है। जहाँ सरकार एक तरफ सुपर स्वास्थ्य सेवाएं देने का दम भर रही है, वहीं दूसरी तरफ सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को 'चपरासी ग्रेड' के मानदेय पर धकेलना समझ से परे है। यदि न्यूरो सर्जरी जैसे महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञों की कद्र नहीं की गई, तो प्रदेश की मेधावी प्रतिभाएं निजी अस्पतालों या दूसरे राज्यों का रुख करने पर मजबूर हो जाएंगी। अब गेंद सरकार के पाले में है - क्या वह इस ऐतिहासिक वेतन विसंगति को सुधारकर डॉक्टरों का सम्मान बहाल करेगी, या फिर हिमाचल के सुपर स्पेशलिटी अस्पताल केवल खाली इमारतों और रिक्त पदों का ढांचा बनकर रह जाएंगे ?
बता दें कि अगर तंत्र का यही रवैया रहा, तो सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा कभी खत्म नहीं होगा। प्रतिभा पलायन के लिए डॉक्टरों को दोष देने से पहले सरकार को अपने इन 'अजीबोगरीब' नियमों पर गौर करना होगा। यदि काबिलियत की कद्र महज 33 हजार रुपये ही है, तो फिर प्रदेश से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की उम्मीद करना बेमानी है।
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