"हिमाचल प्रदेश में 'व्यवस्था परिवर्तन' के दावों के बीच एक ऐसी प्रशासनिक विसंगति सामने आई है, जिसने सेवा नियमों और सरकारी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुक्खू सरकार ने सोलन जिले के उन चार कानूनगो को प्रमोट कर 'नायब तहसीलदार' बना दिया है, जो करीब 9 महीने पहले ही अपना कार्यकाल पूरा कर रिटायर हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि जो अधिकारी अब विभाग का हिस्सा ही नहीं हैं, उन्हें न केवल पदोन्नति का तोहफा दिया गया है, बल्कि उनकी नई पोस्टिंग के आदेश भी जारी करने की तैयारी है। आखिर रिटायरमेंट के बाद इस 'मेहरबानी' के पीछे का असली खेल क्या है और इससे प्रदेश के खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा—पढ़ें यह विशेष रिपोर्ट।"

प्रतीकात्मक फोटो : AI
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार अपने 'व्यवस्था परिवर्तन' के दावों को लेकर अक्सर चर्चा में रहती है, लेकिन हाल ही में राजस्व विभाग से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल प्रशासनिक नियमों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि आम जनता और बेरोजगार युवाओं को भी हैरान कर दिया है। सरकार ने सोलन जिले के उन चार कानूनगो (Kanungo) को पदोन्नत (Promote) कर नायब तहसीलदार बना दिया है, जो लगभग 9 महीने पहले ही सरकारी सेवा से पूरी तरह रिटायर हो चुके हैं।

अधिसूचना ने उड़ाए होश: रिटायर अफसरों की 'घर वापसी' की तैयारी ?
25 फरवरी 2026 को अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) कमलेश कुमार पंत द्वारा जारी की गई अधिसूचना ने सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालयों तक खलबली मचा दी है। इस सरकारी आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि सोलन जिले से संबंधित चार पूर्व कानूनगो—प्रेम चंद, सरवण सिंह, धनी सिंह और विजय कांत—को नायब तहसीलदार के पद पर पदोन्नत किया गया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि इन नवनियुक्त अधिकारियों की पोस्टिंग के आदेश अलग से जारी किए जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि जो व्यक्ति विभाग की दहलीज छोड़ चुके हैं, उनकी 'पोस्टिंग' कहाँ और किस आधार पर होगी?
तारीखों का फेरबदल और प्रशासनिक सुस्ती
हैरानी की बात यह है कि ये सभी अधिकारी साल 2025 की पहली छमाही में ही रिटायर हो चुके थे। रिकॉर्ड के अनुसार, प्रेम चंद, धनी सिंह और विजय कांत 30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त हुए, जबकि सरवण सिंह 31 मई 2025 को रिटायर हुए। सरकार का तर्क है कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की सिफारिशें और लोक सेवा आयोग की सलाह के आधार पर यह निर्णय लिया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मई 2025 में ही इन नामों पर सहमति बन गई थी, तो फाइल को 9 महीनों तक दबाकर क्यों रखा गया? क्या यह प्रशासनिक अक्षमता है या इसके पीछे कोई गहरी सोची-समझी रणनीति?

आर्थिक लाभ और पेंशन पर पड़ेगा बड़ा असर
इन चारों पूर्व अधिकारियों को अब नायब तहसीलदार का पे-मेट्रिक्स (₹43, 000 से ₹1.36 लाख) दिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि रिटायरमेंट के बाद इस तरह की 'बैकडेट' पदोन्नति से अधिकारियों को वित्तीय लाभ मिलने की संभावना है। उनकी अंतिम आहरित सैलरी (Last Drawn Salary) बढ़ जाएगी, जिसका सीधा असर उनकी पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों पर पड़ेगा। जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह से उपयोग करना, विशेषकर जब प्रदेश पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, चर्चा का विषय बना हुआ है।
बेरोजगारों के जख्मों पर नमक: सेवा विस्तार की बढ़ती संस्कृति
एक तरफ हिमाचल प्रदेश का युवा सड़कों पर उतरकर नई भर्तियों और समय पर रिजल्ट की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार रिटायर्ड कर्मचारियों पर मेहरबानी बरसा रही है। सुक्खू सरकार के कार्यकाल में राजस्व विभाग में पटवारियों, कानूनगो और तहसीलदारों को दोबारा नौकरी पर रखने (Re-employment) का चलन बढ़ गया है। आलोचकों का कहना है कि नए और ऊर्जावान युवाओं को मौका देने के बजाय, पुराने और रिटायर हो चुके चेहरों को लाखों के पैकेज पर सेवा विस्तार देना प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
16 अन्य अधिकारियों की भी हुई चांदी
इस अधिसूचना में केवल इन चार रिटायर अफसरों का ही नाम नहीं है, बल्कि वर्तमान में कार्यरत 16 अन्य कानूनगो को भी नायब तहसीलदार के पद पर पदोन्नत किया गया है। हालांकि, सेवारत कर्मचारियों की पदोन्नति एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन रिटायर हो चुके लोगों के साथ इनका नाम जुड़ने से पूरी चयन प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है। विभाग के भीतर भी इस फैसले को लेकर दो फाड़ है; कुछ इसे 'हक' बता रहे हैं, तो कुछ इसे नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वाला कृत्य।

व्यवस्था परिवर्तन या प्रशासनिक विफलता?
हिमाचल प्रदेश में सेवामुक्त हो चुके अधिकारियों को पदोन्नति देने का यह मामला केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नीतिगत शुचिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब प्रदेश का युवा वर्ग सरकारी नौकरियों के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है और चयन आयोगों की कार्यप्रणाली पर टकटकी लगाए बैठा है, ऐसे में 'रिटायर्ड' कर्मचारियों पर सरकार की यह विशेष मेहरबानी युवाओं के मनोबल को तोड़ने वाली है।
यह फैसला न केवल वित्तीय नियमों के लचीलेपन को दर्शाता है, बल्कि प्रदेश के खाली खजाने पर पेंशन और एरियर (Arrears) के रूप में अतिरिक्त बोझ भी डालता है। यदि विभागीय पदोन्नति समितियाँ (DPC) समय पर निर्णय नहीं ले पातीं और फाइलें महीनों सचिवालय की धूल फांकती रहती हैं, तो इसका खामियाजा राज्य के वित्तीय ढांचे और प्रशासनिक अनुशासन को भुगतना पड़ता है।
अंततः, सुक्खू सरकार के 'व्यवस्था परिवर्तन' के दावों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब ऐसी विसंगतियों को दूर कर पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता दी जाए। रिटायर हो चुके चेहरों को मलाईदार पदों से नवाजने के बजाय, ऊर्जावान और सेवारत अधिकारियों को समय पर अवसर देना ही सुशासन की असली कसौटी होगी।