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हिमाचल | चंबा

जब 'सरकार गांव के द्वार' में वीआईपी मंच छोड़ जनता की दरी पर जा बैठे विधायक... प्रशासन के फूले हाथ-पांव - देखें पूरी खबर..

February 28, 2026 02:19 PM
ओम प्रकाश ठाकुर

लोकतंत्र में जब एक चुने हुए विधायक की आवाज़ ही विधानसभा में अनसुनी कर दी जाए, तो वो न्याय मांगने कहाँ जाएगा? सत्ता के गलियारों में सिस्टम की बेरुखी की पोल खोलती एक हैरान कर देने वाली तस्वीर सामने आई है चंबा के भरमौर से, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। मौका था 'सरकार गांव के द्वार' कार्यक्रम का। सामने सजा था वीआईपी मंच, जिस पर विधानसभा अध्यक्ष सहित तमाम बड़े चेहरे मौजूद थे। लेकिन भरमौर के विधायक डॉ. जनकराज ने इस वीआईपी तामझाम को ठुकरा दिया और सीधे आम जनता के बीच दरी पर जाकर बैठ गए। विधायक का सीधा आरोप है कि पिछले तीन सालों से सदन में उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। बीच कार्यक्रम में विधायक के इस बगावती तेवर से अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। मान-मनौव्वल, मिन्नतों और हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच क्या कुछ हुआ इस 'सरकार गांव के द्वार' कार्यक्रम में... देखें पूरी खबर.."

चम्बा: (HD News); लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि की आवाज़ सत्ता के गलियारों में अनसुनी कर दी जाए, तो वह विरोध का नया रास्ता चुनता है। ऐसा ही एक हैरान कर देने वाला वाकया "सरकार जनता के द्वार" कार्यक्रम में देखने को मिला। यहाँ वीआईपी संस्कृति और प्रोटोकॉल को पूरी तरह दरकिनार करते हुए क्षेत्र के विधायक जनकराज सीधे आम जनता के बीच जा बैठे। उनके इस अप्रत्याशित कदम ने न केवल सरकारी अमले की नींद उड़ा दी, बल्कि कार्यक्रम में न्याय की आस लेकर आए हर आम शख्स का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

तीन साल की खीझ और अनसुनी शिकायतों का दर्द: विधायक जनकराज का यह कदम अचानक या बिना किसी कारण के नहीं उठाया गया था, बल्कि यह पिछले तीन सालों से दबे हुए उस आक्रोश का प्रकटीकरण था, जिसे वे सिस्टम से लड़ते हुए महसूस कर रहे थे। जनता के बीच जमीन पर बैठकर उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा, "मुझे इसी आम जनता ने अपना नुमाइंदा चुनकर विधानसभा की चौखट तक पहुंचाया है। मैं पिछले तीन सालों से सदन में पूरी ताकत और प्रमुखता के साथ अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठा रहा हूँ, लेकिन दुर्भाग्य है कि वहां कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जब विधानसभा में मेरी आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है, तो मुझे वीआईपी मंच पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है।"

"यहीं से सवाल पूछूंगा, और शांति से जवाब सुनूंगा": उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा तंज कसते हुए कहा कि आज जब सरकार खुद चलकर 'जनता के द्वार' पर जनसमस्याएं सुनने आई है, तो एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका दायित्व मंच की शोभा बढ़ाना नहीं, बल्कि अपनी जनता की ढाल बनना है। जनकराज ने स्पष्ट किया, "मैंने तय किया है कि मैं आज किसी मंच पर नहीं, बल्कि आम आदमी के साथ बैठूंगा। यहीं से सरकार के सामने अपने लोगों की बात रखूंगा और बहुत ही शांति से सरकार का जवाब भी सुनूंगा।"

राजनीतिक परिपक्वता: विरोध मगर बिना किसी हंगामे के: इस मूक लेकिन बेहद धारदार विरोध के बीच विधायक ने यह भी सुनिश्चित किया कि सरकारी काम में कोई बाधा न आए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया कि उनका मकसद इस कार्यक्रम में कोई व्यवधान डालना या सस्ती लोकप्रियता के लिए हंगामा खड़ा करना कतई नहीं है। उन्होंने भावुक होते हुए याद दिलाया कि उनकी राजनीतिक हैसियत और विधानसभा की कुर्सी इसी जनता की बदौलत है। इसलिए जब जनता अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए धक्के खा रही है, तो उनका असली स्थान मंच के आरामदायक सोफे पर नहीं, बल्कि इसी भीड़ का हिस्सा होना है।

अधिकारियों के फूले हाथ-पांव और फजीहत का डर: एक मौजूदा विधायक का सरकार या प्रशासन के सामने आम जनता की तरह न्याय की गुहार लगाने के लिए बैठ जाना, मौके पर मौजूद अधिकारियों के लिए किसी भारी फजीहत से कम नहीं था। जैसे ही आला अधिकारियों की नजर जनता के बीच बैठे विधायक पर पड़ी, पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया। अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए और वे बदहवासी में दौड़कर विधायक के पास पहुंचे। कार्यक्रम का एजेंडा अचानक जनसमस्याओं से हटकर 'विधायक जी को मनाने' पर केंद्रित हो गया।

मौके की नजाकत और मीडिया के कैमरों को देखते हुए उच्चाधिकारियों ने तुरंत मोर्चा संभाला। विधायक जनकराज से काफी मान-मनौव्वल की गई। लंबी जद्दोजहद और भारी मिन्नतों के बाद, आखिरकार अधिकारी उन्हें जनता के बीच से उठाकर ससम्मान 'सरकार जनता के द्वार' कार्यक्रम के मुख्य स्टेज तक ले जाने में कामयाब रहे। हालांकि, अधिकारियों ने उन्हें मंच पर तो बैठा दिया, लेकिन इस घटना ने सिस्टम की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है कि जब एक विधायक की सुनवाई नहीं हो रही, तो आम आदमी का क्या हाल होगा?

 

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