पश्चिम बंगाल विधानसभा के नव-निर्वाचित विधायकों के लिए आयोजित प्रबोधन कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने संसदीय कार्यप्रणाली और प्राइवेट मेंबर बिलों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विधायकों को जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहने का संदेश दिया। पढ़ें विस्तार से.
शिमला/कोलकाता : (HD News); हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा कि आज़ादी के बाद से अब तक संसद में प्रस्तुत किए गए हजारों प्राइवेट मेंबर (गैर-सरकारी सदस्य) विधेयकों में से केवल 14 विधेयकों को ही राष्ट्रपति की मंजूरी मिल सकी है। वर्ष 1970 के बाद से कोई भी प्राइवेट मेंबर बिल संसद के दोनों सदनों से पारित नहीं हो पाया, जबकि केवल 17वीं लोकसभा में ही ऐसे 729 विधेयक पेश किए गए, जिनमें से मात्र दो विधेयकों पर चर्चा हुई।
उन्होंने यह बात पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के न्यू टाउन कन्वेंशन सेंटर एवं विधानसभा भवन में 3 और 4 जुलाई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा तथा लोकसभा सचिवालय के संसदीय लोकतंत्र शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (PRIDE) द्वारा आयोजित पश्चिम बंगाल विधानसभा के नव-निर्वाचित सदस्यों के दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम के दौरान कही।

कार्यक्रम के तीसरे सत्र का विषय "विधायी कार्यों के साथ गैर-सरकारी सदस्य विधेयक" था, जिसमें कुलदीप सिंह पठानिया ने अपने संसदीय अनुभव साझा किए। इस अवसर पर एन. के. प्रेमचंद्रन तथा राज्यसभा सचिवालय के पूर्व संयुक्त सचिव प्रदीप चतुर्वेदी ने भी अपने विचार रखे।
अपने संबोधन में पठानिया ने स्पष्ट किया कि प्राइवेट मेंबर वह सदस्य होता है जो मंत्री नहीं होता। ऐसे सदस्यों द्वारा प्रस्तुत विधेयकों को प्राइवेट मेंबर बिल कहा जाता है। उन्होंने कहा कि भले ही ऐसे बहुत कम विधेयक कानून बन पाते हों, लेकिन उनका वास्तविक महत्व महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों को सदन में उठाने, सार्थक बहस शुरू करने, जनमत तैयार करने तथा सरकार को अपनी नीतियों और कानूनों पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करने में निहित होता है।
उन्होंने कहा कि देश के कई महत्वपूर्ण सुधारों की शुरुआत भी पहले प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में हुई और बाद में उन्हें सरकारी विधेयकों का हिस्सा बनाया गया। इसलिए किसी भी प्राइवेट मेंबर बिल की सफलता केवल उसके कानून बनने से नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति पर उसके प्रभाव से भी आंकी जानी चाहिए।

विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि विधायी प्रक्रिया केवल औपचारिक नियमों की श्रृंखला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को लागू करने योग्य अधिकारों और दायित्वों में बदलने का संवैधानिक माध्यम है। नीति निर्माण, विधेयक का प्रारूप तैयार करना, सदन में चर्चा, समिति द्वारा परीक्षण, संशोधन और अंतिम स्वीकृति—इन सभी चरणों का उद्देश्य कानूनों की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है।
उन्होंने नव-निर्वाचित विधायकों से आह्वान किया कि वे अपनी विधायी जिम्मेदारियों का निर्वहन जिज्ञासा, संवैधानिक निष्ठा और जनहित के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ करें। उन्होंने कहा कि किसी विधायक की वास्तविक विरासत उसके कार्यकाल की अवधि या दिए गए भाषणों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके द्वारा बनाए गए गुणवत्तापूर्ण कानूनों, बहस में दिखाई गई दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दिए गए स्थायी योगदान से तय होती है।
अपने संबोधन के अंत में कुलदीप सिंह पठानिया ने सभी नव-निर्वाचित सदस्यों को सफल एवं प्रभावी विधायी जीवन की शुभकामनाएँ देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि उनका कार्य पश्चिम बंगाल विधानसभा की समृद्ध संसदीय परंपराओं को और अधिक मजबूत करेगा।

समिति प्रणाली पर हुई महत्वपूर्ण बैठक
प्रबोधन कार्यक्रम के समापन के बाद समिति प्रणाली की समीक्षा के लिए गठित पीठासीन अधिकारियों की समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक समिति कक्ष में आयोजित हुई। बैठक में समिति के प्रारूप प्रतिवेदन को अंतिम रूप दिया गया तथा सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर कर उसे सर्वसम्मति से अनुमोदित किया।
बाद में आयोजित सांस्कृतिक संध्या के दौरान समिति के सदस्यों ने संयुक्त रूप से ओम बिरला को प्रारूप प्रतिवेदन की हस्ताक्षरित प्रति सौंपते हुए समिति को सौंपी गई जिम्मेदारियों से अवगत कराया। लोकसभा अध्यक्ष ने प्रतिवेदन स्वीकार करते हुए समिति के सभापति एवं सभी सदस्यों की समयबद्ध और चरणबद्ध कार्यप्रणाली की सराहना की तथा उन्हें धन्यवाद दिया।