शिमला के शांति विहार में फोरलेन टनल का निर्माण स्थानीय लोगों के लिए 'विकास के बजाय विनाश' का सबब बन गया है। बिना किसी पूर्व सुरक्षा उपाय और ठोस भूवैज्ञानिक सर्वे के चल रहे इस प्रोजेक्ट ने सैकड़ों लोगों की उम्रभर की गाढ़ी कमाई को खतरे में डाल दिया है। टनल के लिए की जा रही ब्लास्टिंग से मकानों की नींव कांप उठी है और अब तक आठ घरों में गहरी दरारें आ चुकी हैं। मौत के साए और दहशत में रातें गुजार रहे लोगों के भारी विरोध के बाद आखिरकार प्रशासन की नींद टूटी है। आनन-फानन में टनल निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए एनएचएआई (NHAI) को भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और नुकसान की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
शिमला में 'विनाशकारी' विकास की कीमत चुकाते लोग: टनल निर्माण से घरों में दरारें, दहशत में रातें काटने को मजबूर, प्रशासन ने लगाई रोक - पढ़ें पूरी खबर..
शिमला: (HD News); राजधानी शिमला के शांति विहार वार्ड (समिट्री और ढींगू बावड़ी क्षेत्र) में विकास के नाम पर हो रहा निर्माण अब स्थानीय लोगों के लिए विनाश का पर्याय बन गया है। फोरलेन टनल निर्माण के चलते कई मकानों में गहरी दरारें आने के बाद प्रशासन आखिरकार गहरी नींद से जागा है और निर्माण कार्य पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। एनएचएआई (NHAI) और निर्माण कंपनी की लापरवाही का आलम यह है कि बिना किसी ठोस सुरक्षा उपाय और स्थानीय लोगों को भरोसे में लिए बिना ही पहाड़ का सीना छलनी किया जा रहा था।

दहशत के साए में कट रही रातें, ब्लास्टिंग से कांप रहे घर
स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि जमीन के भीतर दो समानांतर टनल बनाने के लिए रात के समय की जा रही ब्लास्टिंग से उनके घरों की नींव हिल गई है। टनल के अलाइनमेंट के सर्वे में आए 10 में से 8 मकानों के फर्श, दीवारों और डंगों में दरारें आ चुकी हैं। लोगों की रातों की नींद हराम हो गई है और वे हर पल इस खौफ में जी रहे हैं कि न जाने कब उनका आशियाना जमींदोज हो जाए। भारी जन आक्रोश और शिकायतों के बाद शनिवार को एडीएम प्रोटोकॉल ज्ञान सागर नेगी की अगुवाई में एक टीम ने मौके का जायजा लिया। इस दौरान खौफजदा और गुस्से से भरे लोगों ने अधिकारियों और कंपनी प्रतिनिधियों को जमकर खरी-खोटी सुनाई।
जांच रिपोर्ट आने तक नहीं हिलेगा एक भी पत्थर
हालात की गंभीरता और लोगों के फूटते गुस्से को देखते हुए प्रशासन ने टनल निर्माण को तुरंत प्रभाव से बंद करवा दिया है। प्रशासन ने एनएचएआई को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक दरारों के असल कारणों की वैज्ञानिक जांच नहीं हो जाती और प्रभावित भवनों को पूरी तरह सुरक्षित करने के कदम नहीं उठाए जाते, तब तक निर्माण कार्य शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

300 मकानों पर मंडरा रहा खतरा, अलाइनमेंट बदलने की उठी मांग
इस खतरे की जद में सिर्फ आठ मकान नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी आबादी खौफ में है। पूर्व महापौर संजय चौहान ने सख्त लहजे में कहा कि इस क्षेत्र के करीब ढाई से तीन सौ मकानों पर खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोगों की जान और जीवनभर की पूंजी की कीमत पर कोई भी विकास मंजूर नहीं किया जाएगा। यदि वैज्ञानिक जांच में भविष्य में और नुकसान की आशंका पुष्ट होती है, तो टनल का अलाइनमेंट (संरेखण) हर हाल में बदला जाना चाहिए।
शिकायत के बाद जागी कंपनी, भूवैज्ञानिक सर्वे की मांग तेज
स्थानीय पार्षद विनीत शर्मा ने कंपनी और एनएचएआई की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों तक को इस निर्माण की भनक और सुरक्षा मानकों के बारे में विश्वास में नहीं लिया गया। जब भवन मालिकों ने शिकायत दर्ज कराई, तब जाकर कंपनी को वीडियोग्राफी और मॉनिटरिंग उपकरणों की याद आई। उन्होंने मांग की है कि सिर्फ प्रभावित भवनों का ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का भूवैज्ञानिकों से सर्वे करवाया जाए। भवनों की 'स्टेबिलिटी रिपोर्ट' तैयार हो और नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा दिया जाए।

उम्रभर की गाढ़ी कमाई पर चला 'विकास' का बुलडोजर
प्रभावित परिवारों की दास्तान इस लापरवाह कार्यप्रणाली की पोल खोलती है:
राजेंद्र जस्टा का दर्द छलक कर बाहर आया— "हमारी उम्रभर की पूंजी इन मकानों में लगी है, जिस पर आज खतरा मंडरा रहा है। प्रशासन को हमारी संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी देनी होगी।"
पूनम ने खौफनाक रातों का जिक्र करते हुए कहा— "रात में काम शुरू होते ही घरों में कंपन महसूस होता है और अजीब आवाजें आती हैं। न जाने कब क्या हो जाए। हमें ऐसा विनाश को दावत देने वाला विकास नहीं चाहिए।"
राजेंद्र चौहान और अंशुल चौहान ने कंपनी को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि टनल का अलाइनमेंट ही घरों के नुकसान की असल वजह है। अगर काम आगे बढ़ा तो सैकड़ों घर ढह सकते हैं। शिकायत करने से पहले कंपनी ने सुरक्षा का एक भी एहतियाती कदम नहीं उठाया था।
शांति विहार की दरकती दीवारें और दहशत में डूबी रातें सिर्फ ईंट-पत्थर का नुकसान नहीं हैं, बल्कि यह उस 'अंधे विकास' की खौफनाक तस्वीर हैं जहां नियम-कानून और इंसान की जिंदगी को ताक पर रख दिया जाता है। एनएचएआई और निर्माण कंपनी की यह कार्यप्रणाली इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि बंद कमरों में बनने वाली योजनाएं धरातल की हकीकत और मानवीय संवेदनाओं से कितनी दूर होती हैं। अब गेंद पूरी तरह से प्रशासन और सरकार के पाले में है। सवाल सिर्फ चंद मकानों की दरारों का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों के अस्तित्व का है जो हर पल खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। समय की मांग है कि इस मामले में किसी भी तरह की लीपापोती के बजाय एक पारदर्शी, स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच हो, जिसमें जवाबदेही तय की जाए। विकास निस्संदेह जरूरी है, लेकिन नागरिकों की कब्र खोदकर और उनके आशियाने उजाड़ कर बनाई गई कोई भी टनल प्रगति का नहीं, बल्कि सिस्टम की घोर संवेदनहीनता का ही स्मारक कहलाएगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह समाचार रिपोर्ट स्थानीय निवासियों के बयानों, जनप्रतिनिधियों की शिकायतों और स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई प्रारंभिक कार्रवाई तथा मौके की स्थिति के आधार पर तैयार की गई है। घरों में आई दरारों का मुख्य कारण टनल निर्माण (ब्लास्टिंग) है या कोई अन्य भौगोलिक वजह, इसकी अंतिम और आधिकारिक पुष्टि विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी। इस खबर का प्राथमिक उद्देश्य किसी भी संस्था या कंपनी की छवि धूमिल करना नहीं है, बल्कि जनहित से जुड़े इस अति-संवेदनशील मुद्दे, नागरिक सुरक्षा और जमीनी हकीकत को शासन-प्रशासन के संज्ञान में लाना है।