अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चंदे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के संगीन आरोपों को लेकर हिमाचल प्रदेश का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने सीधे तौर पर भाजपा सरकार और उसके शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करते हुए इस पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज (Sitting Judge) की निगरानी में कराने की पुरजोर मांग की है। उन्होंने श्री राम मन्दिर चंदा चोरी प्रकरण को देश के करोड़ों सनातनियों की आस्था के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात और भाजपा का 'दोहरा चरित्र' करार दिया है। विक्रमादित्य सिंह ने कड़े लहजे में कहा कि जिस पार्टी ने 30 साल तक प्रभु श्रीराम के नाम पर केवल सत्ता हथियाने की राजनीति की, आज उन्हीं के राज में राम मंदिर के नाम पर हो रही महा-लूट ने भाजपा के भ्रष्टाचार मुक्त दावों की कलई खोल दी है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि अगर ऐसा गंभीर मामला किसी कांग्रेस सरकार के दौरान सामने आया होता, तो भाजपा नेता अब तक पूरे देश में उग्र प्रदर्शन करती।
अतः उन्होंने इस पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायिक जांच की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आ सकें। पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चंदे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के संगीन आरोपों ने हिमाचल प्रदेश के सियासी गलियारों में एक अभूतपूर्व भूचाल ला दिया है। सूबे के लोकनिर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधे तौर पर भाजपा सरकार और उसके शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यह केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि शुचिता और राजनीतिक शुचिता (Political Accountability) के नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ने की एक सुनियोजित रणनीति है। विक्रमादित्य सिंह ने इस पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज (Sitting Judge) की निगरानी में कराने की पुरजोर मांग करके इस बहस को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया है।
आरोपों की धुरी: कथित वित्तीय अनियमितताएं और साक्ष्यों का दावा
शिमला में मीडिया से बातचीत में लोकनिर्माण मंत्री ने जिन शब्दों का चयन किया, वे भाजपा के 'भ्रष्टाचार मुक्त' होने के दावों पर सीधा और तीखा आघात हैं। उन्होंने इस प्रकरण को देश के करोड़ों सनातनियों की अटूट आस्था के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात और भाजपा का 'दोहरा चरित्र' करार दिया है।
सीसीटीवी (CCTV) साक्ष्य: मंत्री ने दावा किया कि मंदिर के भीतर हो रही कथित चोरी और वित्तीय हेराफेरी की गतिविधियां अब सीसीटीवी कैमरों में भी दर्ज हो चुकी हैं।
भूमि घोटाला: उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर से संबद्ध जमीनों के सौदों में बड़े पैमाने पर करोड़ों रुपये का गबन (Financial Fraud) हुआ है।
संस्थागत मौन: उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे तंत्र में कई रसूखदार सत्ताधारी नेताओं की संलिप्तता है, जिसके कारण केंद्रीय जांच एजेंसियां मूकदर्शक बनी हुई हैं।

राजनीतिक दोहरे मापदंड और 'नैरेटिव' की लड़ाई
"यदि चंदा चोरी और वित्तीय हेराफेरी का ऐसा कोई भी मामला किसी कांग्रेस शासित राज्य या कांग्रेस सरकार के दौरान सामने आया होता, तो यही भाजपा नेता अब तक पूरे देश की सड़कों पर उग्र आंदोलन खड़ा कर चुके होते।" — विक्रमादित्य सिंह
विक्रमादित्य सिंह का यह बयान भाजपा के उस आक्रामक विपक्ष वाले स्वरूप की याद दिलाता है जो वह अक्सर कांग्रेस सरकारों के समय अपनाती रही है। उनका यह तर्क भाजपा को रक्षात्मक मोड (Defensive Mode) में लाने के लिए काफी है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप मढ़ा कि इस कथित महाघोटाले को छिपाने के लिए आज पूरी पार्टी ने मौन व्रत धारण कर लिया है और जांच के नाम पर केवल एसआईटी (SIT) का झुनझुना थमाया जा रहा है, जो कि सरकारी दबाव में निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं है।
तीन दशकों की 'राम राजनीति' और शुचिता का संकट
भाजपा के वैचारिक मूल पर प्रहार करते हुए मंत्री ने कहा कि जिस राजनीतिक दल ने पिछले 30 वर्षों तक देश के भीतर केवल सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए प्रभु श्रीराम के नाम का राजनीतिकरण किया, आज उसी के शासनकाल में मंदिर की पवित्रता और मर्यादा पर सवाल उठ रहे हैं। सत्ता मिलते ही राम नाम पर की जा रही यह कथित 'लूट-खसूट' भाजपा के असली चेहरे और उनके 'दोगले चरित्र' (Double Character) को पूरी तरह से बेनकाब करती है। यही कारण है कि जब अब तथ्य और सच सामने आ रहे हैं, तो सत्तापक्ष के नेताओं में बेचैनी साफ देखी जा सकती है।

'सनातन' का प्रमाणपत्र और विरासत की दुहाई
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और अन्य नेताओं द्वारा कांग्रेस को 'सनातन विरोधी' साबित करने की कोशिशों पर विक्रमादित्य सिंह ने बेहद सधे हुए और आक्रामक अंदाज में पलटवार किया। उन्होंने अपनी धार्मिक और राजनीतिक विरासत को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे:
प्राण प्रतिष्ठा के गवाह: उन्होंने याद दिलाया कि अयोध्या में आयोजित राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आमंत्रित होने और वहां शामिल होने वाले वे हिमाचल प्रदेश के इकलौते कैबिनेट मंत्री थे।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनका परिवार पीढ़ियों से सनातन परंपराओं और देव संस्कृति का संवाहक रहा है, जिसे किसी भी राजनीतिक दल के 'सर्टिफिकेट' की आवश्यकता नहीं है।
विधायी रिकॉर्ड: उन्होंने भाजपा को आईना दिखाते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश में सख्त 'धर्मांतरण विरोधी कानून' भी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान ही लाया गया था।

उन्होंने नसीहत दी कि भाजपा नेता धर्म के स्वघोषित ठेकेदार बनना बंद करें और जनता को इस बात का सीधा जवाब दें कि भगवान के नाम पर संग्रहित धन में लगी इस सेंधमारी का सच क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस अब इस मुद्दे को केवल मीडिया तक सीमित रखने के मूड में नहीं है। विक्रमादित्य सिंह ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस इस विषय को प्रदेश के कोने-कोने में जनता के बीच लेकर जाएगी।
यह रणनीति आगामी चुनावों और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जहां एक तरफ भाजपा खुद को राम मंदिर निर्माण के एकमात्र सूत्रधार के रूप में पेश करती रही है, वहीं विपक्ष अब उसी मंदिर के प्रबंधन और चंदे में पारदर्शिता को लेकर उसे जनता की अदालत में घेरने की तैयारी कर चुका है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा हिमाचल ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।