"शिक्षा के माध्यम से समाज सुधार की उम्मीदों को उस समय करारा झटका लगा, जब चंबा के भंजराड़ू दंगल मेले में सरकारी प्राइमरी स्कूल तिस्सा के बच्चों द्वारा एक 'जातिवादी नाटक' का मंचन किया गया। अनुसूचित जाति समुदाय के प्रति नफरत और हीनता फैलाने वाली इस घटना ने पूरे प्रदेश में आक्रोश की लहर दौड़ दी है। संविधान के मूल सिद्धांतों को तार-तार करने वाले इस कृत्य के खिलाफ अब 'गदर फ्रंट' ने मोर्चा खोल दिया है, जिसके बाद शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए 18 जुलाई तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने का भरोसा दिया है।" पढ़ें विस्तार से..
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भंजराड़ू दंगल मेले में सरकारी प्राइमरी स्कूल तिस्सा के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किए गए एक नाटक का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस संबंध में गदर फ्रंट (हिमाचल प्रदेश) के अध्यक्ष रवि कुमार दलित के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने शिमला स्थित सचिवालय में प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री को एक शिकायत पत्र सौंपते हुए सरकारी स्कूल के बच्चों द्वारा अनुसूचित जाति समुदाय के विरुद्ध मंचन किए गए 'घृणास्पद और जातिवादी नाटक' की कड़ी निंदा की और इस जघन्य घटना में संलिप्त दोषियों के विरुद्ध तत्काल बर्खास्तगी व एफआईआर दर्ज करने की पुरजोर मांग की है।

घटना का विवरण देते हुए रवि कुमार दलित ने बताया कि दिनांक 11 जुलाई 2026 को भंजराड़ू, जिला चंबा में आयोजित दंगल मेले के दौरान सरकारी प्राइमरी स्कूल तिस्सा (GSSS तिस्सा) के बच्चों ने एक ऐसा नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें अनुसूचित जाति समुदाय को अत्यंत अपमानजनक और हेय दृष्टि से चित्रित किया गया था। इस कृत्य को संगठन ने शिक्षा व्यवस्था पर एक काला धब्बा करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक शिक्षण संस्थान के बच्चों से इस तरह का नाटक करवाना यह दर्शाता है कि इसके पीछे स्कूल के प्रधानाचार्य, शिक्षकों और प्रबंधन की सोची-समझी साजिश है, जिन्होंने जानबूझकर बच्चों का इस्तेमाल जातिवादी घृणा फैलाने के लिए किया है।

इस गंभीर मामले को लेकर गदर फ्रंट ने कानूनी कार्रवाई की सख्त मांग उठाई है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि यह कृत्य 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989' की धारा 3(1)(r), 3(1)(s) और 3(2)(va) का सीधा उल्लंघन है। साथ ही, 'भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023' की धारा 196 (समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) और धारा 197 (राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध कार्य) के तहत भी यह एक दंडनीय अपराध है। संगठन ने जोर देकर कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 का सीधा उल्लंघन है, जो समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है।
प्रशासनिक स्तर पर भी इस मामले ने हलचल पैदा कर दी है। हिमाचल प्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने घटना का संज्ञान लेते हुए दिनांक 15 जुलाई 2026 को पत्र क्रमांक 1-2/2024-SC Commission-691 जारी कर उपायुक्त चंबा को 7 दिनों के भीतर विस्तृत कार्यवाही रिपोर्ट तलब करने के निर्देश दिए हैं। गदर फ्रंट का स्पष्ट मानना है कि यदि इस मामले में कोई ढिलाई बरती गई, तो यह प्रदेश में सामाजिक अशांति का कारण बन सकता है।

शिक्षा मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में संगठन ने सात प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें स्कूल के प्रधानाचार्य और सभी दोषी अध्यापकों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करने, उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी करने और स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने की मांग शामिल है। इसके अलावा, पूरे मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच करवाकर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट सार्वजनिक करने, प्रभावित अनुसूचित जाति समुदाय से सार्वजनिक माफी मांगने और उचित मुआवजा देने की भी मांग की गई है। साथ ही, प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में जातिवाद विरोधी जागरूकता अभियान और शिक्षकों के लिए अनिवार्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण शुरू करने का सुझाव भी दिया गया है।

बैठक के दौरान शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए तत्काल जांच के आदेश दिए हैं। मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया है कि इस घटना पर सख्त संज्ञान लिया जाएगा और 18 जुलाई तक दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। इस मुलाकात के समय गदर फ्रंट के अध्यक्ष रवि कुमार दलित के साथ समिति के उपाध्यक्ष अमित वाल्मीकि, अंबेडकर वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष प्रितपाल सिंह मट्टू, मदद सेवा ट्रस्ट के संयोजक विकास, सफाई कर्मचारी यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष अशोक, एडवोकेट रणवीर, किशोरी लाल तथा अन्य कई सदस्य मौजूद थे।
"अतः यह स्पष्ट है कि इस मामले में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही प्रदेश की सामाजिक शांति के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। पीड़ित समुदाय और नागरिक समाज की मांगें स्पष्ट हैं - दोषियों पर कानूनी कार्रवाई और विभागीय बर्खास्तगी। अब गेंद पूरी तरह से सरकार और जिला प्रशासन के पाले में है। यदि तय समय के भीतर दोषियों पर कड़ी कानूनी गाज नहीं गिरती है, तो यह घटना राज्य के संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रशासन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा देगी। प्रदेश की जनता अब ठोस कार्रवाई का इंतजार कर रही है ताकि न्याय की जीत हो और भविष्य में कोई भी शिक्षक या प्रबंधन समिति बच्चों के माध्यम से जातिवादी जहर फैलाने का दुस्साहस न करे।"
