शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में नियमों को ताक पर रखकर ईंट-दर-ईंट खड़ी की गई अवैध इमारतों पर अब नगर निगम का हथौड़ा चलने वाला है। सरकारी जमीनों पर कब्जा जमाने वाले अतिक्रमणकारियों और तय नक्शों की धज्जियां उड़ाने वाले भवन मालिकों पर निगम ने अपना शिकंजा कस दिया है। शनिवार को आयुक्त कोर्ट में हुई ताबड़तोड़ सुनवाई ने यह साफ कर दिया है कि राजधानी में अब 'अवैध निर्माण' बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 19 मामलों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए 4 ढांचों को तत्काल प्रभाव से जमींदोज करने का फरमान सुना दिया है।

अतिक्रमण की इंतहा: सरकारी जमीन पर ही तान दिए शौचालय
आयुक्त कोर्ट में सुनवाई के दौरान अतिक्रमणकारियों की बेखौफी का हैरान करने वाला सच सामने आया। पंथाघाटी और ईदगाह क्षेत्रों में कुछ लोगों ने दुस्साहस दिखाते हुए सीधे नगर निगम की बेशकीमती जमीन पर ही कब्जा कर वहां शौचालय बना डाले। इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने किसी भी तरह की रियायत देने से इनकार कर दिया और इन अवैध निर्माणों को तुरंत उखाड़ फेंकने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।
नक्शे से खिलवाड़ करने वालों पर भी गिरी गाज
कार्रवाई की यह आंच सिर्फ सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों तक ही सीमित नहीं रही। छोटा शिमला इलाके में उन दो भवन मालिकों को भी कोर्ट ने आईना दिखा दिया, जिन्होंने चालाकी से स्वीकृत नक्शे के विपरीत जाकर अपनी छतों को आगे बढ़ाकर अतिरिक्त निर्माण कर लिया था। निगम ने साफ संदेश दिया है कि कागजों में कुछ और, तथा जमीन पर कुछ और बनाने की इस 'हेराफेरी' को अब बख्शा नहीं जाएगा। इन दोनों अतिरिक्त निर्माणों को भी तोड़ने के स्पष्ट आदेश दे दिए गए हैं।

निगम का अल्टीमेटम: 'खुद तोड़ो, वरना हम तोड़ेंगे और बिल भी भेजेंगे'
नगर निगम ने अतिक्रमणकारियों को सीधी चेतावनी दी है कि या तो वे तय समय के भीतर खुद अपना अवैध निर्माण हटा लें, अन्यथा निगम का दस्ता मौके पर पहुंचेगा और ढांचे को मलबे में तब्दील कर देगा। बड़ी बात यह है कि निगम की इस कार्रवाई में जो भी खर्च आएगा, उसकी पाई-पाई की वसूली भी संबंधित भवन मालिक की जेब से ही की जाएगी। इसके अलावा, कोर्ट ने पुराने लंबित मामलों की फाइलें भी तलब कर ली हैं और अधिकारियों से अब तक की गई कार्रवाई का पूरा हिसाब मांगा है।
शिमला में नगर निगम की यह ताबड़तोड़ कार्रवाई उन तमाम लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है, जो सोचते हैं कि वे सरकारी व्यवस्था की आंखों में धूल झोंककर अवैध निर्माण कर सकते हैं। अतिक्रमणकारियों से खर्च वसूलने का फैसला और पुराने मामलों की फाइलों का खुलना यह साबित करता है कि निगम अब 'जीरो टॉलरेंस' के मूड में है। अगर यह सख्ती कागजों से निकलकर पूरी तरह जमीन पर उतरी, तो यकीनन शिमला को अवैध कंक्रीट के जंगल में तब्दील होने से बचाया जा सकेगा।
