उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में कड़ाके की ठंड और हल्की बर्फबारी के बीच बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम में दीपावली का त्योहार अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कपाट बंद होने के दिन नजदीक आने के कारण इस समय दोनों धामों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है। कड़ाके की ठंड के बावजूद दिवाली के पावन पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान बद्रीविशाल और बाबा केदार के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
आज सुबह से ही बद्रीनाथ मंदिर को गेंदे के फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से भव्य रूप से सजाया गया था। बद्री-केदार मंदिर समिति के पदाधिकारियों और तीर्थ पुरोहितों ने मिलकर गर्भगृह में विशेष पूजा-अर्चना की। शाम के समय मंदिर परिसर को हजारों दीयों और मोमबत्तियों से रोशन किया गया, जिससे बर्फ से ढकी चोटियों के बीच मंदिर का नजारा अत्यंत अलौकिक प्रतीत हो रहा था। यात्रियों ने जय बद्रीविशाल के जयकारों के साथ महाआरती में भाग लिया।

उधर, केदारनाथ धाम में भी दीपोत्सव की धूम रही। गर्भगृह में बाबा केदार का विशेष श्रृंगार किया गया और स्वयंभू शिवलिंग पर विशेष पंचामृत अभिषेक किया गया। रात्रि के समय केदारनाथ मंदिर की कत्यूर शैली की नक्काशी रंग-बिरंगी रोशनी से खिल उठी। बर्फ की सफेद चादर पर दीयों की टिमटिमाती रोशनी ने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान मंदिर समिति द्वारा सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद भी वितरित किया गया।
चूंकि नवंबर के मध्य में दोनों धामों के कपाट शीतकाल के लिए बंद होने वाले हैं, इसलिए इस दीपोत्सव को इस साल का सबसे बड़ा और अंतिम सामूहिक उत्सव माना जा रहा है। मंदिर के धर्मशास्त्रियों के अनुसार, हिमालय की इन कंदराओं में दिवाली मनाने का अपना एक अलग आध्यात्मिक महत्व है, जहां प्रकृति और परमात्मा का सीधा जुड़ाव महसूस होता है। भक्तों ने इस पावन ठंड में भी भक्ति की गर्माहट का अनुभव किया।