हिमाचल प्रदेश में इन दिनों सियासी पारा चरम पर है। जहाँ एक ओर सत्ता पक्ष के भीतर मंत्रियों की आपसी बयानबाजी और अफसरशाही की नाराजगी सुर्खियां बटोर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश का आम नागरिक कुदरत के कहर और प्रशासनिक मंदी की दोहरी मार झेल रहा है। रिकॉर्ड तोड़ सूखे के कारण किसानों की फसलें बर्बाद हो रही हैं और पेयजल योजनाएं दम तोड़ रही हैं, लेकिन शासन और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी ने धरातलीय समस्याओं को हाशिए पर धकेल दिया है। पेश है प्रदेश के वर्तमान हालातों पर एक विशेष रिपोर्ट।
शिमला: (HD News); हिमाचल प्रदेश की वर्तमान स्थिति उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ एक तरफ सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों के बीच 'बयानों की जंग' छिड़ी है, तो दूसरी तरफ प्रदेश की आम जनता बुनियादी सुविधाओं के अभाव में 'अस्तित्व की जंग' लड़ रही है। प्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन का नारा तो गूंज रहा है, लेकिन धरातल पर जो 'धींगा-मुश्ती' दिखाई दे रही है, उसने शासन और प्रशासन दोनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

1. बयानों का 'रायता' और कांग्रेस की अंतर्कलह
विवाद की शुरुआत कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हालांकि भ्रष्टाचार और ईमानदारी के बीच की महीन लकीर को पहचानना हर जागरूक नागरिक का हक है, लेकिन इसमें 'राज्य' शब्द का समावेश यानी अन्य राज्यों का संदर्भ देना राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। इसके जवाब में जिस तरह से पहली बार मंत्री बने चार दिग्गजों ने मोर्चा संभाला, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। यह बयानों की कशमकश अब निजी अहम् की लड़ाई बनती जा रही है, जिससे सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी (Collective Responsibility) की छवि धूमिल हो रही है।
2. अफसरशाही का 'ईगो' और ईमानदारी का तराजू
इस सियासी आग में घी डालने का काम आईएएस (IAS) एसोसिएशन के प्रेस नोट ने किया। यह दिलचस्प है कि जो अधिकारी प्रदेश की रीढ़ कहलाते हैं, वे एक बयान से 'आहत' होकर लामबंद हो गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रदेश की 'इंटेग्रिटी लिस्ट' और हाईकोर्ट में लंबित मामले इन अफसरों की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाते? कहा जा सकता है कि सभी अफसर गलत नहीं हैं, लेकिन सभी 'संत' भी नहीं हैं। जब चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी अपनी मांगों के लिए लड़ता है तो उसे सर्विस रूल्स समझाए जाते हैं, लेकिन जब शीर्ष अधिकारी राजनीतिज्ञों से सीधे टकराते हैं, तो वह मर्यादा कहाँ लुप्त हो जाती है?

3. प्रकृति का कहर: सूखे से तड़पता किसान
राजनीति के इस शोर में हिमाचल के अन्नदाता की सिसकियां दब गई हैं। सितंबर के बाद से प्रदेश में बारिश का कोटा 90 प्रतिशत से अधिक कम रहा है। रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, 40 प्रतिशत तक तबाह हो चुकी है। तिलहन की खेती (सरसों) का इस बार नामोनिशान नहीं है। जिन खेतों में पीली सरसों लहलहानी चाहिए थी, वहां आज धूल उड़ रही है। विडंबना देखिए कि जनता द्वारा जनता के लिए चुने हुए प्रतिनिधि आपस मे भीड़ रहे हैं, जबकि किसानों को 'स्पेशल गिरदावरी' और मुआवजे का इंतजार है।
4. जल संकट और बुनियादी ढांचे की विफलता
हिमाचल प्रदेश में जल शक्ति विभाग की लगभग 30 प्रतिशत पेयजल योजनाएं पूरी तरह प्रभावित हो चुकी हैं। नदियां और पारंपरिक स्रोत सूख रहे हैं। सिरमौर के दूरदराज इलाकों से लेकर कांगड़ा और चंबा तक, लोग तीन-चार किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। यह स्थिति केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता भी है। जब सरकार का ध्यान आपसी कलह सुलझाने में होगा, तो जल संकट जैसी गंभीर आपदा से निपटने की रणनीति कौन बनाएगा?
5. व्यवस्था की पोल: डिपो में राशन नहीं, एम्बुलेंस में तेल नहीं
प्रदेश की स्वास्थ्य और खाद्य आपूर्ति व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है। एक तरफ हुक्मरानों के लिए नई गाड़ियां और तामझाम तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के कई अस्पतालों में खड़ी एम्बुलेंस में तेल भरवाने तक के पैसे नहीं हैं। तीमारदारों से तेल के पैसे मांगे जा रहे हैं। सरकारी डिपुओं में राशन की किल्लत है। बेरोजगारी का आलम यह है कि युवा 'पिटारा खुलने' के इंतजार में बूढ़े हो रहे हैं, लेकिन भर्ती के नाम पर केवल आश्वासन ही हाथ लग रहे हैं।

बयानों की राजनीति बनाम धरातल की हकीकत
इस पूरे घटनाक्रम का सार यह है कि हिमाचल प्रदेश इस समय एक 'दोहरी चुनौती' से गुजर रहा है। एक तरफ शासन और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी के कारण राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है, तो दूसरी तरफ कुदरत के कहर ने आम जनजीवन को बदहाली के कगार पर ला खड़ा किया है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव: जहाँ सत्ता पक्ष के भीतर मंत्रियों की आपसी खींचतान और नौकरशाही के साथ 'शीत युद्ध' सुर्खियों में है, वहीं जनता के वास्तविक मुद्दे जैसे—सूखा, बेरोजगारी और महंगाई—प्रशासनिक फाइलों में दबे नजर आ रहे हैं।
प्रशासनिक सुस्ती और जन-पीड़ा: 90% बारिश की कमी और 40% फसल की बर्बादी एक बड़ी आपदा की ओर इशारा कर रही है। जब 30% पेयजल योजनाएं सूख रही हों और अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव हो, तब सरकार की प्राथमिकता आपसी विवाद सुलझाने के बजाय 'क्राइसिस मैनेजमेंट' होनी चाहिए।
संवाद और समन्वय की आवश्यकता: 'व्यवस्था परिवर्तन' का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब शासन (नेता) और प्रशासन (अफसर) एक दिशा में काम करें। आपसी अहम् की लड़ाई अंततः प्रदेश के विकास की गति को रोकती है और जनता का भरोसा तंत्र से कम करती है।
हुक्मरानों को यह समझने की जरूरत है कि जनता ने उन्हें 'कुश्ती' लड़ने के लिए नहीं, बल्कि प्रदेश चलाने के लिए चुना है। जब शासन ढीला होता है, तो प्रशासन भी बेगाम हो जाता है। हिमाचल की जनता बयानों से नहीं, बल्कि राशन, पानी, स्वास्थ्य और रोजगार से संतुष्ट होगी। व्यवस्था परिवर्तन का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब हुक्मरानों का ध्यान आपसी स्कोर सेट करने के बजाय खेतों की प्यास बुझाने और अस्पतालों में दवा उपलब्ध कराने पर केंद्रित होगा।
⚠️ डिस्क्लेमर (Disclaimer): विचारों की मौलिकता: यह संक्षिप्त लेख वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संजीव शर्मा द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए विश्लेषणात्मक वीडियो में व्यक्त किए गए व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है।
जनता त्रस्त, माननीय मस्त - डॉ. संजीव शर्मा