हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों को लेकर चल रहा कानूनी गतिरोध आखिरकार समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सुक्खू सरकार की 'पुनर्सीमांकन' और 'आपदा प्रबंधन' की दलीलों को दरकिनार करते हुए साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव को प्रशासनिक प्रक्रियाओं के नाम पर अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाला जा सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की खंडपीठ ने शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को 31 मई 2026 तक हर हाल में चुनाव संपन्न कराने की अंतिम समय-सीमा (डेडलाइन) तय कर दी है। हालांकि, हाईकोर्ट के 30 अप्रैल के आदेश के मुकाबले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को एक महीने की अतिरिक्त राहत जरूर दी है।
शिमला/नई दिल्ली: (HD News); हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज और शहरी निकाय चुनावों को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी और राजनीतिक गतिरोध अब समाप्त हो गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए सुक्खू सरकार को निर्देश दिया है कि प्रदेश में 31 मई 2026 तक हर हाल में चुनाव संपन्न करा लिए जाएं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जयमाल्या बागची की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी स्थिति में संवैधानिक संस्थाओं के चुनाव को 'पुनर्सीमांकन' या प्रशासनिक प्रक्रियाओं की आड़ में टाला नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, मिली एक माह की राहत
इस पूरे प्रकरण में राहत की बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित की गई समय सीमा को थोड़ा बढ़ा दिया है। इससे पहले, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को 30 अप्रैल तक चुनाव कराने का अल्टीमेटम दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को 'विशेष अनुमति याचिका' (LSP) के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब शीर्ष अदालत ने सरकार की व्यवहारिक दिक्कतों को देखते हुए एक महीने की अतिरिक्त मोहलत दी है, जिससे सरकार को चुनावी तैयारियों के लिए अब 31 मई तक का समय मिल गया है।
आपदा बनाम चुनाव: सरकार के तर्कों की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में सुक्खू सरकार ने 'प्राकृतिक आपदा' को सबसे बड़ा आधार बनाया था। सरकार का कहना था कि हिमाचल प्रदेश हाल ही में भारी बारिश और आपदा के कारण बड़े पैमाने पर हुए नुकसान से जूझ रहा है और प्रदेश में वर्तमान में 'आपदा प्रबंधन अधिनियम' प्रभावी है। सरकार ने तर्क दिया था कि संसद द्वारा बनाया गया आपदा प्रबंधन कानून, राज्य के पंचायती राज अधिनियम से ऊपर है, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में चुनाव कराना संभव नहीं है। सरकार ने यह भी दलील दी कि हाईकोर्ट ने जमीनी हकीकत को पूरी तरह समझे बिना ही समय सीमा तय की थी।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकना संभव नहीं
अदालत ने सरकार की दलीलों को सुनने के बाद यह माना कि यद्यपि आपदा एक गंभीर विषय है, लेकिन इसके आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि हिमाचल में पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 को ही समाप्त हो चुका है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी चुनाव न होने के कारण ग्रामीण विकास और प्रशासनिक कार्यों पर इसका सीधा असर पड़ रहा था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अब यह सुनिश्चित कर दिया है कि मई के अंत तक हिमाचल में जमीनी लोकतंत्र फिर से बहाल हो जाएगा।
राजनीतिक सरगर्मी और आगामी रणनीति
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे सरकार की नैतिक हार और लोकतंत्र को दबाने की कोशिशों पर विराम बता रहा है, वहीं सरकार अब चुनाव आयोग के साथ मिलकर चुनावी कैलेंडर तैयार करने की तैयारी में जुट गई है। अब गेंद राज्य चुनाव आयोग के पाले में है कि वह कैसे 31 मई की डेडलाइन के भीतर पूरी चुनावी मशीनरी को सक्रिय कर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करता है।
