10 मिनट में ग्रोसरी पहुंचाने का दावा करने वाली क्विक कॉमर्स कंपनियों (ब्लिंकिट, जेप्टो, इंस्टामार्ट) के लिए अब बुरे दिन शुरू होते नजर आ रहे हैं। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद अब सरकार ने इन कंपनियों के प्रीडेटरी प्राइसिंग (बाजार बिगाड़ने वाली कीमतें) और डार्क स्टोर मॉडल पर हंटर चलाने की तैयारी कर ली है। इस कड़े रुख से इन कंपनियों के बोर्डरूम में हड़कंप मच गया है।
वाणिज्य मंत्रालय और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की रडार पर अब इन कंपनियों के वो तौर-तरीके आ गए हैं, जिन्होंने देश भर के लाखों छोटे किराना व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। आरोप है कि ये कंपनियां विदेशी फंडिंग के दम पर भारी डिस्काउंट देकर बाजार पर एकाधिकार जमा रही हैं। इसके साथ ही डिलीवरी बॉयज के अमानवीय वर्किंग आवर्स और सुरक्षा को लेकर भी श्रम मंत्रालय ने सख्त नोटिस जारी किया है।
वित्तीय मोर्चे पर भी इन तथाकथित 'यूनिकॉर्न्स' की हालत खस्ता है। करोड़ों रुपये हर महीने फूंकने के बावजूद इनमें से अधिकांश कंपनियां असली मुनाफे से कोसों दूर हैं। अब तक केवल ग्रोथ की कहानी सुनकर पैसा लुटाने वाले वेंचर कैपिटलिस्ट (VCs) भी अब मुट्ठी भींचने लगे हैं और वे स्पष्ट रूप से मुनाफे की डेडलाइन मांग रहे हैं, जिससे कंपनियों पर दबाव चरम पर है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि क्विक कॉमर्स का यह बुलबुला अब फूटने की कगार पर है। सरकारी नियमों का फंदा कसने और फंडिंग का नल सूखने के बाद, इन कंपनियों के पास अपने बिजनेस मॉडल को पूरी तरह बदलने या बंद होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 10 मिनट का यह तिलिस्म नए सरकारी नियमों की भट्टी में तपकर कुंदन बनेगा या राख में तब्दील हो जाएगा।