भारत के सबसे कमाऊ और सुरक्षित माने जाने वाले आईटी (IT) सेक्टर में इन दिनों मातम पसरा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सुनामी ने देश की दिग्गज टेक कंपनियों के बोर्डरूम से लेकर कर्मचारियों के केबिन तक दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। मुनाफे को रफ्तार देने और खर्चों में भारी कटौती की अंधी दौड़ में, टॉप आईटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर वर्कफोर्स को घटाने और नई भर्तियों को रोकने के सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

इस अभूतपूर्व संकट की जड़ में जेनरेटिव एआई (Generative AI) है, जिसने रातों-रात कोडिंग, सॉफ्टवेयर टेस्टिंग, डेटा एनालिसिस और कस्टमर सपोर्ट जैसे अहम कामों पर अपना कब्जा जमा लिया है। जो प्रोजेक्ट पहले सैकड़ों इंजीनियरों की फौज महीनों में पूरा करती थी, अब वही काम एआई टूल्स की मदद से चंद लोग कुछ ही हफ्तों में निपटा रहे हैं। अमेरिका और यूरोप के विदेशी क्लाइंट्स ने भी अपने आउटसोर्सिंग बजट में भारी कटौती कर दी है और वे भारतीय कंपनियों पर एआई के जरिए सस्ती और तेज डिलीवरी का दबाव बना रहे हैं।

इस तकनीकी तख्तापलट का सबसे खौफनाक असर फ्रेशर्स और मिड-लेवल मैनेजमेंट पर पड़ रहा है। देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्लेसमेंट का भारी सूखा पड़ गया है, क्योंकि आईटी कंपनियों ने अपनी मास-हायरिंग (थोक में भर्ती) पर लगभग पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है। 10 से 15 साल के अनुभव वाले उन कर्मचारियों की कुर्सियां भी बुरी तरह डोलने लगी हैं, जिन्होंने समय रहते नई तकनीकों को नहीं अपनाया। बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद के टेक पार्कों में अब प्रमोशन की नहीं, बल्कि पिंक स्लिप (बर्खास्तगी पत्र) मिलने की दहशत छाई हुई है।

बाजार के दिग्गजों और मानव संसाधन (HR) विशेषज्ञों ने खुली चेतावनी दी है कि यह छंटनी का अंत नहीं, बल्कि एक खौफनाक शुरुआत है। भारतीय आईटी उद्योग का वह सुनहरा दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है, जहां सिर्फ एक बेसिक कोडिंग डिग्री के दम पर दशकों तक नौकरी सुरक्षित रहती थी। अब 'अपस्किल' (कौशल विकास) या 'आउट' (बाहर) ही इस निर्मम कॉर्पोरेट दुनिया का इकलौता नियम बन गया है, जिसने लाखों युवाओं के सुनहरे भविष्य को अधर में लटका दिया है।