भारत के कॉर्पोरेट इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी तकनीकी जंग का बिगुल बज चुका है। देश के दो सबसे बड़े औद्योगिक घराने—टाटा समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज—अब सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्र में आमने-सामने आ गए हैं। अरबों डॉलर के निवेश के साथ दोनों समूहों ने गुजरात और महाराष्ट्र में मेगा फैब्रिकेशन प्लांट लगाने का ऐलान कर दिया है, जिसने वैश्विक बाजार को चौंका दिया है।
टाटा संस ने जहां ताइवान की दिग्गज कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी कर चिप असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग में शुरुआती बढ़त बना ली है, वहीं रिलायंस ने अपनी अथाह पूंजी और आक्रामक रणनीति के साथ इस मैदान में एंट्री मारी है। मुकेश अंबानी की योजना न केवल भारत की घरेलू जरूरतों को पूरा करने की है, बल्कि वे सीधे तौर पर ताइवान और दक्षिण कोरिया के वैश्विक दबदबे को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।
इस कॉरपोरेट महायुद्ध का सीधा असर वैश्विक भू-राजनीति और सप्लाई चेन पर पड़ रहा है। अमेरिका और यूरोप की दिग्गज टेक कंपनियां चीन प्लस वन (China+1) रणनीति के तहत भारत के इन दोनों महारथियों पर दांव लगा रही हैं। भारत सरकार की पीएलआई (PLI) योजना ने इस आग में घी का काम किया है, जिससे देश में विदेशी निवेश की सुनामी आ गई है।
जानकारों का कहना है कि यह केवल दो कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर बनने की सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है। हालांकि, इस जंग में शुरुआती कैश बर्न (वित्तीय नुकसान) ऐतिहासिक स्तर का होगा, क्योंकि सेमीकंडक्टर निर्माण एक बेहद खर्चीला और जटिल काम है। अंततः इस प्राइस वॉर और टेक्नोलॉजी की होड़ का सबसे बड़ा फायदा भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार को ही मिलने वाला है।