सनातन धर्म में सबसे पवित्र माने जाने वाले कार्तिक मास की साधना इन दिनों पूरे देश में पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ चल रही है। 3 नवंबर की भोर में ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजकर 50 मिनट से 5 बजकर 42 मिनट) के दौरान देश की प्रमुख पवित्र नदियों के घाटों पर लाखों कल्पवासियों और श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई।
वाराणसी में दशाश्वमेध और अस्सी घाट, प्रयागराज में त्रिवेणी संगम, हरिद्वार में हर की पौड़ी, उज्जैन में शिप्रा तट और मथुरा में यमुना के घाटों पर सूर्योदय से पूर्व ही भक्तों का तांता लग गया। कार्तिक स्नान का व्रत रखने वाली महिलाओं और साधकों ने ठंडे जल में स्नान कर सूर्य नारायण को अर्घ्य दिया तथा घाटों पर स्थित मंदिरों में दर्शन-पूजन किया।
पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, कार्तिक मास में आकाश मंडल से लेकर नदी के जल तक में दैवीय ऊर्जा का वास होता है। इस माह में किया गया प्रातः स्नान, गीता पाठ और सहस्रनाम का जाप मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के कष्टों को हर लेता है। इसी आस्था के वशीभूत होकर तीर्थ पुरोहितों के सानिध्य में घाटों पर सुबह से ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण और कथा श्रवण चल रहा है।
कार्तिक मास की सबसे प्रमुख परंपरा 'दीपदान' और 'तुलसी पूजन' की है। प्रातः स्नान के पश्चात श्रद्धालुओं ने नदियों की लहरों में पत्तों के दोने में रखकर प्रज्वलित दीप प्रवाहित किए, जिससे भोर के अंधेरे में नदियों के तट जगमगा उठे। इसके साथ ही घरों और मंदिरों में माता तुलसी तथा आंवले के वृक्ष की परिक्रमा कर अखंड सौभाग्य व आरोग्य की कामना की गई।
स्नान और पूजन के उपरांत तीर्थ क्षेत्रों में अन्नदान, वस्त्र दान और गौ सेवा का क्रम भी अनवरत जारी है। संतों और धर्माचार्यों ने प्रातःकालीन प्रवचनों में संदेश दिया कि कार्तिक मास केवल बाहरी स्नान का ही नहीं, बल्कि संयम, सदाचार और सेवा के माध्यम से अंतःकरण को शुद्ध करने का भी सर्वोत्तम पर्व है।