कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के प्रारंभ के साथ ही आज देशभर में अहोई अष्टमी का पावन पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में यह व्रत संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पंचांग के अनुसार, आज दोपहर 2 बजकर 51 मिनट के बाद अष्टमी तिथि लग रही है, जिसके चलते सायंकाल में अहोई माता की पूजा और रात्रि में तारों को अर्घ्य देने का विधान आज ही संपन्न किया जाएगा।

इस व्रत में माताएं दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम के समय घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता और सेई व सेई के बच्चों का चित्र बनाती हैं अथवा बाजार से लाए गए पारंपरिक कैलेंडर की स्थापना करती हैं। पूजा स्थल पर जल से भरा कलश रखकर रोली, चावल, दूध-भात और हलवे-पूरी का भोग लगाया जाता है। पूजा के दौरान हाथ में सात प्रकार के अनाज या गेहूं के दाने लेकर बुजुर्ग महिलाओं से अहोई माता की पारंपरिक व्रत कथा सुनी जाती है, जो अनजाने में हुए दोषों के निवारण और मातृत्व के समर्पण का संदेश देती है।

अहोई अष्टमी के व्रत का पारण रात्रि में आकाश में तारों का दर्शन करने और उन्हें जल का अर्घ्य देने के बाद ही किया जाता है। कई क्षेत्रों में निसंतान दंपति संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत रखते हैं और राधा कुंड में स्नान व दीपदान की परंपरा निभाते हैं। आज रवि पुष्य योग और शुभ योग की उपस्थिति में रखे जा रहे इस व्रत को ज्योतिषीय दृष्टि से भी संतान के भाग्योदय के लिए बेहद कल्याणकारी माना जा रहा है।
